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शुभारम्भ

यह जानना ज़रूरी है…

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सफलता ‘सफलता’ है, ‘सफ़लता’ नहीं। इसमें फूल (पुष्प) वाला ‘फ’ है, न कि अँग्रेज़ी के फ़ूल (मूर्ख) वाला नुक़्ते सहित ‘फ़’। यानी रोमन लिपि में इसे Saphalta लिखा जाना चाहिए, न कि Safalta।
यह ब्लॉग जीवन की ऐसी ही छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिलाने के लिए है, जो बड़ी मायने रखती हैं।

क्या आप सुखी होने को तैयार हैं?

“सुख की अवस्था पहचान में भी नहीं आती है जबकि दुःख तत्काल समझ में आता है।”

सुखी जीवन जीने के लिए सबसे पहले हमें सुख-दुःख को समझना होगा, उन कारणों की खोज करनी होगी, जिसके कारण सुख-दुःख उत्पन्न होते हैं, फिर उनके निवारण के उपायों को खोजकर उसके अनुसार जीना होगा। ये अध्ययन स्वयं को करना होगा, स्वयं को जाँचना और परखना होगा।
यदि हम दुःख को परिभाषित करने की कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि दुःख ऐसी स्थिति-परिस्थिति है, जिसमें हम अव्यवस्था या अंतर्विरोध में जीने के लिए मजबूर होते है और जो हमें सहज रूप से स्वीकार नहीं होता है। अर्थात् इस अस्वीकृति के भाव से अंतर्विरोध एवं अव्यवस्था में जीने के लिए बाध्य होना ही दुःख है। इसके विपरीत हम जिस भी स्थिति-परिस्थिति में जीते हैं उसमें अनुकूलता है, समरसता है, संगीत है और जैसा जीना हमें सहज स्वीकार्य है अर्थात् इस सहज स्वीकृति के साथ व्यवस्था में, समरसता में जीना ही सुख है। जैसे हम जिस कार्यस्थल पर कार्य करते हैं यदि वहाँ के साथी, कर्मचारी, बॉस या अधीनस्थों से हमारा अंतर्विरोध हो तो हमें हमेशा तनाव बना रहता है। उस कार्यस्थल पर हम घुटन महसूस करते हैं। छुट्टी के अगले दिन कार्यस्थल पर बुझे दिल से जाते हैं, शाम को घर लौटते हैं तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने हमारी पूरी ऊर्जा निचोड़ ली हो। इस व्यवस्था में जीने के लिए मजबूर होने को दुःख कहते हैं।
इसी प्रकार प्रतिकूल परिस्थितियों जैसे स्वयं का या किसी प्रियजन का अस्वस्थ होना, लोगों से संबंध ठीक नहीं चलना, मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाना आदि में रहने के लिए मजबूर होने पर व्यक्ति दुःखी रहता है। इसके विपरीत ऐसी परिस्थितियाँ, जहाँ का माहौल ख़ुशनुमा हो, लोग मिल-जुल कर कार्य करते हों, एक-दूसरे का सम्मान एवं सहयोग करते हों, ऐसी परिस्थितियों में जीने को सुख कहते हैं। ऐसी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियाँ कहीं भी हो सकती हैं। जैसे कार्यस्थल पर, घर में, परिवार में, मोहल्ले में, पड़ोस में, समाज में, सरकार के साथ।
इसी प्रकार प्रत्येक मानव जैसा है और जैसा होना चाहता है, यदि दोनों स्थिति में अनुरूपता (हार्मनी) है, संगीत है, ऐक्य (वननेस) है तो सुखी रहता है और यदि दोनों स्थितियों में अंतर्विरोध है, प्रतिकूलताएँ हैं तो दुःखी होता है। सभी व्यक्तियों की मूल प्रकृति (नेचर) भिन्न-भिन्न होती है परंतु अपनी मूल प्रकृति के विपरीत उसे आचरण करते हुए जीना पड़ता है तो वह दुःखी होता है।
यदि वह दूसरों जैसा बनना चाहता है या करना चाहता है परंतु इच्छा शक्ति के अभाव में वह वैसा बन नहीं पाता है या कर नहीं पाता है तो वह इसके लिए लोगों को, परिस्थितियों को या भाग्य को कोसता रहता है। इस प्रकार वह स्वयं में अंतर्द्वंद्व में फँसा रहता है। इस स्थिति में भी व्यक्ति दुःखी रहता है। अर्थात् जैसा वह होना चाहता है और यदि वह वैसा है, तो सुखी होता है, परंतु जैसा वह होना चाहता है और अभी जैसा है, यदि दोनों में अंतर है तो वह दुःखी होता है।
जीवन में सुखी होने के लिए चार चीज़ों की आवश्यकता होती है। यदि ये चारों चीज़ें हमारे जीवन में होंगी तो हम निश्चित रूप से सुखी रहेंगे और हमारे सुख में निरंतरता भी बनी रहेगी। परंतु इनमें से एक भी चीज़ की कमी होगी तो हमारा सुख बाधित हो जाएगा। ये चीज़ें हैं – समाधान, समृद्धि, अभय और संबंध।
समाधान अर्थात् हमें हमारे सारे प्रश्नों के उत्तर मिल जाए और हमारी सभी परेशानियों-समस्याओं का समाधान हो जाए। द्वितीय, समृद्धि अर्थात् हमारे पास हमारी आवश्यकताओं से अधिक धन-साधन-सुविधा हो। तृतीय, अभय अर्थात् समाज में किसी तरह का भय न हो। चतुर्थ, संबंध अर्थात् हम परिवार तथा समाज में एक दूसरे के साथ पूरक बनकर प्रेमपूर्वक रह सकें। परंतु जब हम जीवन जीते हैं तो इसमें हमें तीन प्रकार की बाध्यताएँ समझ में आती हैं – परिस्थितियाँ, व्यक्ति एवं हमारी मान्यताएँ।

अ. परिस्थितियाँ
प्रत्येक व्यक्ति सुखी रहना ही चाहता है परंतु जब सुखी हो नहीं पाता है तो वह इसके लिए या तो भगवान को दोषी ठहराता है या परिस्थितियों को। इस धरती पर यदि हमने जन्म लिया है तो यहाँ हम अकेले नहीं हैं। हम किसी निर्जन टापू पर पैदा नहीं हुए हैं और ना ही यह हमारे पिताजी की जागीर है कि हम जैसा चाहेंगे केवल वैसा ही होगा।
इस संसार में हमारी हैसियत धूल के कण से भी कम की है। इसलिए हमें इस वास्तविकता को स्वीकारते हुए अपना जीवन जीना होगा। इस प्रकार जब हम इन वास्तविकता के साथ जीते हैं और उनका विस्तार करके देखते हैं तो पाते हैं कि ये परिस्थितियाँ निम्न पाँच स्तरों पर हो सकती हैं। ये स्थिति-परिस्थितियाँ हमारे स्वयं में, परिवार में, समाज में, प्रकृति में और अस्तित्व में पैदा होती हैं। जब हम इन पाँचों स्तरों की स्थितियों-परिस्थितियों के साथ सामंजस्य के साथ व्यवस्था एवं तारतम्य बनाकर सहज रूप से जीते हैं तो हम सुखी हो सकते हैं। इसके विपरीत परिस्थितियाँ होती हैं, जिसमें अव्यवस्थाएँ होती हैं या हमारे लिए प्रतिकूलताएँ होती हैं तो हम दुःखी होते हैं।
सभी मनुष्यों को जीवन में प्रतिदिन छोटी-बड़ी मुश्किलों का सामना करना ही पड़ता है। किसी व्यक्ति पर मुश्किल परिस्थितियों का कितना और कैसा प्रभाव पड़ता हैं, यह उसके नज़रिए पर निर्भर करता है। प्रत्येक व्यक्ति का समस्याओं को देखने का नज़रिया भिन्न-भिन्न होता है। कोई व्यक्ति मुश्किल स्थितियों में भी अविचलित एवं प्रसन्न रहता है जबकि कोई छोटी-छोटी मुश्किलों में भी अपना धैर्य खो देता है या दुःखी हो जाता है।
परिस्थितियों को अलग-अलग चश्मे से देखने के संबंध में ब्रह्मकुमारी के डॉ. गिरीश भाई ने बहुत अच्छी व्याख्या की है। नकारात्मक मानसिकता वाले लोगों द्वारा परिस्थितियों को देखने के नज़रिये के आधार पर निम्न प्रकार के लोग हो सकते हैं:

1. परिस्थितियों को बढ़ा-चढ़ाकर देखना
कुछ लोगों की मानसिकता होती है कि वे छोटी-छोटी घटनाओं को भी बहुत बढ़ा-चढ़ा कर देखते हैं। थोड़ा-सा भी कुछ उनके साथ हो जाए तो पूरा घर या आॅफ़िस सिर पर उठा लेते हैं। वे जिस स्थान पर भी रहते हैं उस स्थान का पूरा माहौल ख़राब कर देते हैं। उनमें बिलकुल भी सहन शक्ति नहीं होती है। ऐसे लोगों में आत्म-विश्वास की कमी होती है।

2. चरम नकारात्मकता
कुछ लोग परिस्थितियों के नकारात्मक परिणामों की चरम स्तर की कल्पना कर लेते हैं। अर्थात् यदि अनुकूल परिणाम नहीं रहेगा तो ज़िंदगी ख़त्म हो जाएगी, सब कुछ समाप्त हो जाएगा, ज़िंदगी नरक बन जाएगी आदि-आदि। ऐसे लोग जल्दी एवं बार-बार डिप्रेशन में चले जाते हैं। ऐसे लोगों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति भी होती है।

3. तत्काल निर्णय पर पहुँचना
कुछ लोगों के साथ यदि कोई छोटी-सी भी बात होती है तो वे तत्काल इस निर्णय पर पहुँच जाते हैं कि निश्चित रूप से ग़लत ही होने वाला होगा। ऐसे लोग हमेशा भयभीत एवं सशंकित रहते हैं। वे हमेशा दूसरे को भी शंका की दृष्टि से देखते हैं कि लोग उनको धोखा देंगे, उनका बुरा करेंगे।

4. हमेशा ‘मैं ही क्यों’सोचना
ऐसे लोगों के साथ जब भी कोई घटना घटित होती है तो उनको लगता है कि ऐसा हमेशा उन्हीं के साथ होता है। वे ही हमेशा बॉस के कोपभाजन बनते हैं, उन्हीं का हमेशा नुक़सान होता है, उन्हें ही हमेशा धोखा मिलता है। उनमें हमेशा पीड़ित होने की भावना बनी रहती है। ऐसे लोग अपनी ग़लतियों की भी ज़िम्मेदारी दूसरों पर डालते हैं। ऐसे लोगों के साथ कभी भी कुछ घटित होता है तो तत्काल दूसरे से तुलना करते हैं, और सोचते हैं कि मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ, दूसरे अन्य के साथ ऐसा क्यों नहीं हुआ। ऐसे लोग अपने से ज़्यादा दूसरे लोगों के बारे में सोचते रहते हैं।

5. लेबलिंग
ऐसे लोग हमेशा पूर्वग्रह से ग्रसित होते हैं। ऐसे लोग स्थानों, परिस्थितियों या दूसरे लोगों के प्रति तत्काल एक प्रकार की धारणा बना लेते हैं फिर उसे हमेशा उसी नज़रिए से देखते हैं। वे छोटी-छोटी घटनाओं के आधार पर अपने पूर्वाग्रह को प्रमाणित करने की कोशिश करते रहते हैं और दूसरों से भी इस बात पर ठप्पा लगवाने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोग अपनी धारणाओं एवं पूर्वाग्रहों को दूसरों पर भी थोपने की कोशिश करते रहते हैं। ऐसे लोगों की सोच बदलना बहुत कठिन होता है।

6. पीड़ित मानसिकता
कुछ लोग अपने आप को दुःखी, पीड़ित या कमज़ोर ही दिखाना पसंद करते हैं। जब भी उनसे मिलें तो हमेशा अपना कोई न कोई दुखड़ा लेकर बैठ जाते हैं। उनके साथ कुछ अच्छा भी हुआ तो उसे कम ही आँकते हैं और दुःखी ही प्रस्तुत होते हैं। ऐसे लोग हमेशा अपना रोना रोते रहते हैं।
इस प्रकार के लोग दूसरों की सांत्वना एवं सहानुभूति के भूखे होते हैं। ऐसे लोग भीड़ में अपना महत्त्व स्थापित करने के लिए भी हमेशा पीड़ित बने रहना चाहते हैं। अन्य कारण यह भी हो सकता है कि ऐसे लोग भयभीत होते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि यदि मैंने अपनी ख़ुशहाली या सफलता प्रकट कर दी तो लोग मेरे खिलाफ़ षड्यंत्र करने लगेंगे या मेरी सफलता या ख़ुशी पर किसी की नज़र लग जाएगी।

7. हमेशा बुरा सोचना
ऐसे लोगों के साथ अच्छा भी घटित होता है तो उसमें से भी कुछ न कुछ बुरा निकाल लेते हैं। ऐसे लोग कभी भी किसी भी अच्छे परिणाम की ख़ुशी नहीं मना पाते हैं, ये लोग हमेशा दुःखी ही रहना पसंद करते हैं। ऐसे लोग हमेशा आशंकाओं में ही जीते हैं।

ब. व्यक्ति
हम हमारी परेशानी एवं दुःखों की ज़िम्मेदारी स्वयं नहीं लेते हैं इसके लिए हमेशा दूसरों को दोष देते रहते हैं। हम इस पृथ्वी पर अकेले नहीं हैं। हमें अन्य लोगों के साथ रहना पड़ता है। इसलिए दूसरे लोग आपको प्रभावित करेंगे ही।
यदि आप फ़ुटबॉल के मैदान में उतरे हैं तो आपके विरोध में 11 खिलाड़ी आपको मिलेंगे ही। विरोधी टीम के खिलाड़ी आपको बॉल लेकर गोल की तरफ़ बढ़ने से रोकेंगे ही, इसके लिए वे आपके साथ कुछ भी कर सकते हैं। यहाँ तक कि आपने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की तो वे आप पर ही गोल चढ़ा देंगे। आपके लक्ष्य या गोल पर एक गोलकीपर भी होगा ही जो आपके द्वारा गोल की तरफ़ फेंकी गई प्रत्येक बॉल को रोकने की कोशिश करेगा ही। यही इस खेल का नियम है। इसलिए निराश होने की आवश्यकता नहीं है। आप अपना सर्वश्रेष्ठ खेल खेलते रहें। आपको इन बाधाओं को पार करके ही गोल करना है अर्थात् लक्ष्य पाना है। आप यह शिकायत नहीं कर सकते हैं कि वे मुझे अपने लक्ष्य की तरफ़ नहीं बढ़ने दे रहे हैं क्योंकि यह खेल आपने चुना है। यदि नहीं खेलना चाहते हैं तो मैदान के बाहर बैठिए। कई ओर लोग खेलने के इंतज़ार में बाहर बैठे हुए हैं।
परंतु यह भी सही है कि 11 खिलाड़ी आपके विरोध में खेल रहे हैं तो 10 खिलाड़ी उनसे मुक़ाबला करने के लिए आपकी ओर से भी खेल रहे हैं। आपके द्वारा बहुत मेहनत से अच्छा खेलने के पश्चात् भी हो सकता है कि साथी खिलाड़ियों का आपको उतना सहयोग नहीं मिल पा रहा हो जितना अपेक्षित था और आप हार जाएँ। यह भी हो सकता है कि आपके किसी साथी खिलाड़ी से ही आत्मघाती गोल हो जाए।
ऐसा ही जीवन है। इसमें रुकावटें, समस्याएँ रहेंगी ही, अच्छा-बुरा होगा ही। जब तक जीवन रूपी मैदान में हैं हमें इनसे होकर गुज़रना ही पड़ेगा। इसके लिए हम किसी दूसरे को दोश नहीं दे सकते हैं। शायद कोई दूसरा भी अपनी समस्या के लिए आपको दोषी ठहरा रहा होगा। ऐसा सभी लोग कर रहे हैं, एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं।
इसी तरह वास्तव में जीवन में भी कुछ लोग हमारे साथ में खड़े हैं और कुछ हमारे विरोध में। लेकिन हमें सभी परिस्थितियों को समझकर ही जीवन को बहुत सहजता से जीना पड़ेगा।
इन व्यवस्थाओं में प्रसन्नतापूर्वक रहने के लिए हमें स्वयं के माध्यम से मानव को समझना होगा। जब हम स्वयं को समझ लेते हैं तो संसार में रहने वाले समस्त मानव भी समझ में आ जाते हैं। इस प्रकार सही समझ से अंतर्द्वंद्व एवं अंतर्विरोध समाप्त हो जाता है और हम सभी सुखी होते हैं।

स. मान्यताएँ
हमारे जीवन को सबसे ज़्यादा प्रभावित हमारी अपनी मान्यताएँ ही करती हैं। हमने हमारे जीवन में बहुत-सी मान्यताएँ बना रखी हैं, जो जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण तय करती हैं और यही दृष्टिकोण हमारे जीवन की दिशा तय करता है। हमारी बहुत-सी मान्यताओं ने हमें जकड़ रखा है जिसके कारण हमारी सोच में संकीर्णता आ गई है जिसके कारण हम परेशान एवं दुःखी रहते हैं।

स्मरणीय बिंदु

  • सुख और दुःख को समझना बहुत ज़रूरी है। दुःख के कारणों को पता कर उनका निवारण करना ही सुखी जीवन की कुंजी है।
  • मनुष्य जैसा होना चाहता है और यदि वह वैसा है, तो सुखी होता है।
  • मनुष्य जैसा होना चाहता है और अभी वह जैसा है, दोनों में अंतर है, तो वह दुःखी होता है।

(पुस्तक यहाँ उपलब्ध है।)

अटल बिहारी वाजपेयी के अनजाने पहलू

विनम्र अटल की कठोरता, अविवाहित वाजपेयी का प्रेम, कविहृदय की कूटनीतिक चालें और संघी अटल का कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ाव… इस किताब में जानने और चौंकने को बहुत कुछ है!

कुछ दिनों पहले मैं रुटीन चेकअप के लिए बेटी को लेकर बच्चों की डॉक्टर के पास गया था। हमारी बेटी सब्ज़ियों के नाम पर सिर्फ़ आलू और भिंडी खाती है। बाक़ी सब्ज़ियों को वह बहुत कहने पर “चख़” भर लेती है।

तो मैंने बेटी को सुनाते हुए डॉक्टर से इस बात की शिकायत की। मेरी उम्मीद के विपरीत, डॉक्टर ने इसे बहुत सामान्य ढंग से लिया और कहा कि 10-11 साल की उम्र तक के सारे बच्चे ऐसा ही करते हैं।

बहरहाल, भिंडी के लिए तो नहीं कह सकता, पर आलू मुझे भी बहुत पसंद है और मेरे पिता जी को भी। अक्सर कहा जाता है कि “आलू और अमिताभ” तो सबको पसंद होते ही हैं। आप इस पसंदगी में दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी को भी जोड़ सकते हैं।

हाल ही में अटल जी के निधन के बाद, कुछ अपवादों को छोड़कर, लगभग सभी इन्सानों से उन्हें बड़ी शिद्दत से याद किया। यह अटल जी का करिश्मा ही है कि मणिशंकर अय्यर जैसे खाँटी कांग्रेसी भी उनका शुमार “स्वतंत्रता के बाद की राजनीति के सर्वाधिक आकर्षक व्यक्तित्वों” में करते हैं।

अटल जी लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में रहे और 13 दिन के अपने पहले कार्यकाल सहित तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे। ज़ाहिर है, उन पर काफ़ी कुछ लिखा और कहा जा चुका है। पर इस सबके बावजूद, उनके जीवन के कई पहलू रहस्यमय बने रहे और आमतौर पर उनके विराट व्यक्तित्व की आभा में छुपे रहे।

ऐसे में, श्री उल्लेख एन.पी. की मूल अँग्रेज़ी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद “वाजपेयी; एक राजनेता के अज्ञात पहलू” इस मायने में अनूठी है कि वह उनके प्रभामंडल के इतर, उन्हें एक राजनेता के तौर पर ही देखती है और उनसे जुड़े असहज कर देने वाले प्रश्नों पर भी अन्वेषण करती है।

पुस्तक में उल्लेख का परिचय कहता है कि वे “केरल स्थित मार्क्सवादियों के गढ़ कन्नूर में राजनेताओं के परिवार में जन्मे” थे। यह परिचय संकेत देता है कि उनसे वाजेपयी के प्रति भक्ति-भाव की उम्मीद नहीं की जा सकती। यही वजह है कि लेखक उल्लेख कई ऐसी बातों का उल्लेख भी करते हैं, जिन्हें अन्यथा छोड़ दिया जाता।

जैसा कि किताब के शीर्षक में “अज्ञात पहलू” शब्द आते हैं, वाक़ई उन्होंने अपने गहन शोध से कई ऐसे तथ्य उद्घाटित किए हैं, जो आमतौर पर अनजाने-से हैं। जैसे- अटल जी का अपने छात्र जीवन में मार्क्सवादी पार्टी की छात्र शाखा का सदस्य होना या फिर आपातकाल में जेल यात्रा के दौरान टाइफ़ाइड होने पर उनके अपेंडिक्स का ऑपरेशन कर दिया जाना।

राजकुमारी कौल के साथ उनके संबंधों पर उल्लेख बहुत ज़्यादा तो नहीं लिखते, लेकिन यह बताना नहीं भूलते कि आमतौर पर विनम्र वाजेपयी निजता के मामले में कितने “कठोर” हो जाया करते थे और कैसे राजकुमारी कौल को “कौल गर्ल” कहने वाले एक राजनेता हाशिए पर धकेल दिए गए थे।

पुस्तक अटल जी की जीवनी भर नहीं है। चूँकि उनका सार्वजनिक जीवन सुदीर्घ और व्यापक, दोनों रहा, इसलिए इसमें उनके साथ-साथ आज़ादी मिलने के दशक से लेकर 21वीं सदी के पहले दशक तक के हालत का भी विस्तार से वर्णन है। इस तरह यह क़रीब 70 बरस का राजनीतिक दस्तावेज़ भी है।

किताब में कई घटनाएँ हैं, क़िस्से हैं, तत्कालीन परिस्थितियों का वर्णन है और लोगों के मनोभाव भी हैं। इनके बीच अटल जी की ख़ूबियाँ, ख़ासकर भाषणकला और हाज़िरजवाबी कई बार सोदाहरण सामने आती है।

किताब बताती है कि आम धारणा के उलट, वे कुशल कूटनीतिज्ञ भी थे और कैसे उन्होंने जनसंघ और फिर भाजपा में अपनी शीर्ष स्थिति की राह प्रशस्त की, और उनके प्रतिद्वंद्वी व भविष्य में ख़तरा बन सकने वाले नेता एक-एक कर ग़ुमनामी में जाते रहे।

उल्लेख ने बतौर राजनेता, उनके कार्यों का सम्यक विवेचन भी किया है। जनता पार्टी सरकार में जब वे विदेशमंत्री के रूप में नेपाल को संबोधित करते हुए कहते हैं कि ‘जिस देश के हर कंकर में शंकर है, उसके लिए भारत को सदा श्रद्धा रखनी ही पड़ेगी’, तो समझा जा सकता है कि इस एक वाक्य ने नेपाल के दिल में भारत के लिए कितना लगाव और भरोसा पैदा किया होगा।

पुस्तक एक राजेनता और लोकप्रिय व्यक्तित्व से बढ़कर, सर्वमान्य नेता और अजातशत्रु के रूप में वाजपेयी के विकास को समझने के लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण है। कहीं-कहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दूवादी विचारधारा के प्रति पूर्वग्रह झलकने के बावजूद, यह आमतौर पर अटल जी और उनके साथ-साथ चलने वाली भारतीय राजनीति का निष्पक्ष विवेचन करती है।

इस संदर्भ में यह किताब उनको भी पढ़नी चाहिए, जो अटल जी और उनकी पार्टी की विचारधारा से इत्तेफ़ाक नहीं रखते। उनके प्रशंसकों के लिए यह किताब “मस्ट रीड” श्रेणी की तो है ही!

पुस्तक : वाजपेयी; एक राजनेता के अज्ञात पहलू
लेखक : श्री उल्लेख एन.पी
अनुवादक : श्री महेंद्र नारायण सिंह यादव
प्रकाशक : Manjul Publishing House
मूल्य : 350 रुपए

एक “उबाऊ दुनिया” की दास्तानें इतनी मोहक भी हो सकती हैं…?

कुछ किताबें अटल बिहारी वाजपेयी की तरह होती हैं- आलोचना से परे। आप उनके सान्निध्य का आनंद उठाते हैं, उनसे सीखते हैं, उनसे जानकारी और प्रेरणा पाते हैं। ऐसी किताबों की समीक्षा नहीं होती। श्री प्रकाश बियाणी की पुस्तकें- “शून्य से शिखर तक” और “लोकल से ग्लोबल” इसी श्रेणी में आती हैं।

अँग्रेज़ी के पायोनियर (Pioneer) में प्रवर्तक, पथ-प्रदर्शक, मार्ग-निर्माता अग्रदूत, अग्रणी जैसे अर्थ समाहित हैं। इनमें से कोई एक शब्द पायोनियर को पूर्णत: अभिव्यक्त नहीं कर सकता। इसलिए, यह कहना उपयुक्त होगा कि दोनों किताबें हिन्दी में अर्थजगत के व्यक्तित्वों पर लेखन की “पायोनियर” हैं।

कॉर्पोरेट वर्ल्ड की हस्तियों पर हिन्दी में ऐसा गहन शोध आधारित, व्यवस्थित, सिलसिलेवार लेखन पहले नहीं हुआ और अब भी अन्यत्र दुर्लभ ही है। “शून्य से शिखर” 2004 में आई थी और “लोकल से ग्लोबल” 2010 में, जो पूर्ववर्ती का संशोधित और परिवर्धित संस्करण है। शून्य… में जहाँ 35 हस्तियों पर क़लम चलाई गई थी, वहीं लोकल… में 50 कॉर्पोरेट्स शामिल हैं।

मुख्यत: उद्योग जगत से जुड़ी हस्तियों पर लेखन में हिसाब-किताब और आँकड़े आ ही जाते हैं। ऐसे में, लेखन के उबाऊ हो जाने का ख़तरा बहुत अधिक होता है। लेकिन इसके उलट, ये किताबें रोचक हैं। भाषा और शैली, दोनों बढ़िया हैं।

अक्सर शिवाजी सावंत रचित “मृत्युंजय” के बारे में कहा जाता है कि अच्छी हिन्दी सीखने के लिए उसे पढ़ना चाहिए। लेकिन वह मराठी में लिखी गई किताब का बेहतरीन हिन्दी अनुवाद है। शून्य… और लोकल… मूल रूप से हिन्दी में लिखी किताबें हैं। इन्हें पढ़ते हुए आप अच्छी हिन्दी के साथ-साथ पाठक को बाँधकर रखने वाली शैली तथा क़िस्सों व आँकड़ों को गूँथकर लेखन में रोचकता भरने की कला भी सीख सकते हैं।

“लोकल से ग्लोबल” में रतन टाटा, कुमारमंगलम बिड़ला, धीरूभाई अंबानी, अमिताभ बच्चन, अज़ीम प्रेमजी, सुभाष चंद्रा, करसनभाई पटेल, सुनील भारती मित्तल, नारायण मूर्ति जैसे जाने-पहचाने नाम हैं, वहीं लार्सन एंड टुब्रो के संस्थापक हेनिंग हॉक लार्सन, कोटक महिंद्रा के उदय कोटक, संगमरमर व्यवसायी पाटनी बंधु, एशियन पेंट्स के अश्विन दानी, महिको उन्नत बीजों वाले डॉ. बद्रीनारायण बारवले जैसे कम चर्चित, किंतु बेहद महत्वपूर्ण शख़्सियतों की दास्तानें भी हैं।

515 पृष्ठों की इस भारी-भरकम (वज़न और महत्व, दोनों के लिहाज़ से) पुस्तक को पढ़ते हुए आप सहज ही समझ जाते हैं कि इसे लिखने में कितना शोध, परिश्रम और समय लगा होगा। इसका हर अध्याय एक आकर्षक भूमिका के साथ शुरू होता है और आगे उस हस्ती के निजी जीवन और कामकाजी सफलता की कहानी इस तरह सामने आती है कि आप एकबारगी भूल ही जाते हैं कि यह कॉर्पोरेट वर्ल्ड जैसे रूखे विषय पर लिखी किताब है।

“लोकल से ग्लोबल” के लेखन में श्री बियाणी के सहयोगी रहे हैं, श्री कमलेश माहेश्वरी। जिस उम्र में लोग अपनी शैली विकसित करते हैं और लिखना सीखते हैं, उन्होंने एक ऐसी किताब में हाथ बँटाया, जो मार्गदर्शक मील के पत्थर की तरह है।

पुस्तक : लोकल से ग्लोबल
लेखकद्वय : श्री प्रकाश बियाणी और श्री कमलेश माहेश्वरी
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ : 515
मूल्य : 350 रुपए (सजिल्द- 750 रु.)

भूतिया कहानी जो डराती नहीं है

कहानी में तीन भूत हैं। और भूतों की आम छवि के उलट, इनमें से दो बड़े सुंदर, सुदर्शन और प्यारे हैं। वे डराने-धमकाने के बजाय बड़े प्रेम और शिष्टता के साथ अपनी बात मनवाते हैं।

पता नहीं क्यों, बहुत दिनों से कोई भूतिया कहानी पढ़ने की तमन्ना हो रही थी। संयोग से कल श्री सुलभ अग्निहोत्री की पोस्ट पर नज़र पड़ी, जिसमें उन्होंने किंडल पर एक भूतिया उपन्यास के मुफ़्त होने की जानकारी दी थी।

आज मध्याह्न 12 बजे मैंने वह किताब डाउनलोड की, और चूँकि ऐसी कोई भी किताब पढ़ने की तीव्र इच्छा तो थी ही, सो तुरंत बाद पढ़ना शुरू भी कर दिया और 44 मिनट में उसे ख़त्म भी कर दिया।

44 मिनट में पूरी पढ़ डालने में मेरी रफ़्तार का कोई योगदान नहीं है, यह है ही इतनी छोटी। यह एक लघु उपन्यास है। नाम है, “ये दुनिया आख़िरी थोड़े ना है” और लेखक हैं, श्री त्रिलोचन नाथ तिवारी।

यह भूतिया उपन्यास है, तो ज़ाहिर तौर पर इसमें भूतों की प्रमुख भूमिका है। कहानी में तीन भूत हैं। और भूतों की आम छवि के उलट, इनमें से दो बड़े सुंदर, सुदर्शन और प्यारे हैं। तीसरा भूत भी सामान्य ही है।

तीनों ही भूत प्रेमिल, स्नेहिल और सज्जन हैं, जो डराने-धमकाने के बजाय बड़े प्रेम और शिष्टता के साथ अपनी बात मनवाते हैं।

कहानी रात में चलती है और उसका बहुत बड़ा हिस्सा अतीत में जीवंत होता है, फिर भी माहौल का वर्णन डराता या दहलाता नहीं है। यानी आप चाहें, तो इसे आधी रात को भी पढ़ सकते हैं (बशर्ते आपको भूतों का नाम सुनते ही डर न लगता हो)।

तारीफ़ की बात है कि कहानी और घटनाक्रम काफ़ी हद तक अनुमान लगाए जाने योग्य हैं, फिर भी रुचिकर हैं। चूँकि आदमी मरने के बाद ही भूत बनता है, इसलिए शुरुआत से ही रहस्य जैसा कुछ नहीं रह जाता।

दरअसल, पाठक पहले से ही यह जानता है कि किताब छोटी-सी है और फिर लेखन शैली भी प्रवाहमय है, इसलिए पढ़ना बोझ नहीं लगता। भाषा सरल उर्दू है, जिसे समझने के लिए शब्दकोश देखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। भाषा-शैली पुराने ज़माने की किताबों की याद दिलाती है और एक हद तक नॉस्टैल्जिया जगाती है।

बस, एक कमी यह है कि कहानी से लगता है खलनायक जीत गए। उनके बुरे हश्र के बारे में कोई संकेत नहीं है। अंत आते-आते पाठक के दिल में नायक-नायिका के लिए सहानुभूति पनप चुकी होती है, इसलिए यह कमी एक कसक छोड़ जाती है।

अगर आप चाहें, तो इस किताब को इन वजहों से पढ़ सकते हैं-
 यह मुफ़्त है (इन पंक्तियों के लिखे जाने तक)/ क़ीमत कम है।
 यह छोटी है, सामान्य गति से भी एक घंटे से कम समय में पढ़ी जा सकती है।
 आपको लगता है कि पुस्तक पूरी करने के लिए बहुत समय चाहिए और इसलिए आप कोई पुस्तक उठाने का साहस नहीं कर पाते, तो यह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि करेगी।
 किताब आपको डराती, दहलाती नहीं है, न ही दिमाग़ पर कोई बोझ डालती है।

पुस्तक – ये दुनिया आख़िरी थोड़े ना है (लघु उपन्यास)
लेखक – श्री त्रिलोचन नाथ शास्त्री
प्रकाशक – श्री सुलभ अग्निहोत्री
डाउनलोड लिंक – यहाँ क्लिक करें

हरदा से आई हादसे की ख़बर

यही टीवी पत्रकारिता का मज़ा है। हर कठिन परिस्थिति में छोटी-छोटी ख़बर तलाशो। कुछ सेकंड की हो, भले ही एक बार चले, मगर हर वक़्त ख़बर पर भिड़े रहो।

मंगलवार की शाम से रात तक हो रही बारिश अब डराने लगी थी। सोते समय ही लग गया था, कल कहीं न कहीं जाना ही पड़ेगा। इंदौर-उज्जैन और देवास में रात में तेज़ बारिश और निचले इलाक़ों में पानी भरने की ख़बरें पत्रकारिता के नए प्लेटफ़ॉर्म वॉट्सएप पर आने लगी थीं।

अपने संवाददातों को अलर्ट कर सोया ही था कि तक़रीबन सवा बारह बजे फ़ोन बजा। स्क्रीन पर चमक रहा था – ‘हरदा समद’। ये हरदा के संवाददाता थे, जो घबराए हुए थे और बताया कि सर, कामायनी एक्सप्रेस की दुर्घटना की ख़बर है। हरदा स्टेशन के पास माचक नदी के पुल पर गाड़ी के कुछ डिब्बे पानी में भी गिर गए हैं। स्टेशन जा रहा हूँ, बाक़ी ख़बर वहीं से दूँगा।

समद से बात करते-करते ड्रॉइंग रूम में आ गया था और पेन-काग़ज़ लेकर गाड़ी का नाम, नंबर और माचक नदी लिखने लगा था। नींद हिरन हो गई थी। ट्रेन एक्सीडेंट और वो भी पानी में गिरे डिब्बे, सोचकर ही होश उड़ गए थे। रेलवे में अपने संपर्कों को फ़ोन मिलाने लगा था।

आधी रात को किसे जगाऊँ, ये झिझक भी थी। मगर फ़ोन जारी थे। कहीं से झिड़की मिल रही थी, तो कहीं से ख़बर का थोड़ा-सा सिरा। मगर थोड़ी देर बाद फिर समद अपडेट लेकर आए, जो और भी ज़्यादा डरावना था। “सर, नदी में एक नहीं दो गाड़ियाँ गिरी हैं। कामायनी के साथ ही जनता एक्सप्रेस भी उसी वक़्त पुल से गुज़र रही थी, दोनों के डिब्बे गिरे हैं। पानी कितना है ये अभी नहीं बता सकता। कलेक्टर साहब स्टेशन पर आ गए हैं। इटारसी से राहत और बचाव वाली ट्रेन आ रही है। संभव हुआ तो उसी में हम सब भी जाएँगे।”

इस बीच में एक-दो नंबर गाड़ियों में सफ़र कर रहे लोगों के मिल चुके थे। जल्दी ही उनसे बात की और ख़बर पक्की होते ही दफ़्तर में इस हादसे की सूचना दे दी। अपने टीवी के पत्रकार साथियों से भी ख़बर का ब्योरा लगातार मिल रहा था।

तय हो गया कि इस बारिश में दुर्घटनास्थल पर निकलना ही होगा। फ़ोन भी लगातार बज रहा था और बैग में सामान भी इकट्ठा हो रहा था। बारिश का मतलब बरसाती, छाता और प्लास्टिक की चप्पल वग़ैरह-वग़ैरह। तेज़ी से हरदा पहुँचने के लिए गाड़ी का इंतज़ाम भी इस बीच में कर लिया था। पूरी तैयारी के बाद ही पत्नी को बताया कि हरदा जा रहे हैं, बस दरवाज़ा बंद कर लो।

तक़रीबन ढाई बजे कैमरामैन मुन्ना भाई और सहायक अभिषेक के साथ हरदा के रास्ते पर बरसते पानी के बीच चले जा रहे थे। तब तक चैनल पर ख़बर ब्रेक हो गई थी। सोचा था गाड़ी में आँखें बंद करेंगे, मगर चैनल पर धाराप्रवाह फ़ोनो चल रहे थे। घटना कैसे हुई, कहाँ हुई, कितने मरे हैं, राहत के क्या इंतज़ाम हैं।

तब तक समद घटनास्थल पर जा पहुँचे थे। उनका मोबाइल कभी लगता, कभी नहीं। उन्हें भी निर्देशित कर रहे थे, बस थोड़े-से शॉट लेकर निकलो जल्दी। मगर वो निकलें तो निकलें कैसे। घटनास्थल भिरंगी स्टेशन के पास था जो हरदा से क़रीब 32 किलोमीटर दूर होगा। तेज़ बारिश और अँधेरे में कहाँ और कैसे जाएँ, ये सोचना भी कठिन हो रहा होगा। जिस रेलवे की ट्रेन से आए थे उसी के साथ लौटना होगा, उन्होंने लाचारी जताई।

इस बीच चार बजे चुके थे। पूरा दफ़्तर जाग गया था। दिल्ली और मुंबई से रिपोर्टरों के आने और ओबी निकालने की पूरी तैयारी हो गई थी। सुबह छह बजने को थे और हम हरदा को पार कर बाईपास से बाहर हो रहे थे। मगर ये क्या! खेड़ीपुरा नाके पर अजनाल नदी पर बने पुल के ऊपर से पानी बह रहा था और पुल के दोनों और वाहनों की लंबी क़तार लगी थी। इससे पहले कि बेबसी बढ़ती, मुन्ना ने कहा- सर स्टेशन चलिए। स्टेशन पर पहुँचते ही लाइव यू ऑन और रिपोर्टिंग का काम चालू।

हरदा स्टेशन पर बदहवासी का आलम, रुकी हुई गाड़ियाँ, कामायनी एक्सप्रेस में सफ़र कर रहे दुर्घटना के क़िस्से सुनाते यात्री, सबकुछ ख़बर था और चैनल पर सबकुछ लाइव कट रहा था। हमारे चैनल पर ये क़िस्से चलते देख बाक़ी के चैनल वाले भी स्टेशन आ गए। सबका हाल बुरा था, सभी कुढ़ रहे थे। घटनास्थल के इतने पास आकर ये बेबसी बुरी लग रही थी।

तभी जैसे भगवान ने रिपोर्टरों की सुन ली। दुर्घटनास्थल पर जाने वाली गाड़ी आई और सारे लोग उसमें लद लिए। ऐसे मौक़ों पर लगता है अजीब-सा काम है पत्रकारिता भी। लोग हादसे की जगह से दूर भागते हैं, मगर हम पत्रकार उस जगह पर जल्दी पहुँचने में जी-जान लगा देते हैं।

चलती गाड़ी में ही वॉक थ्रू किए जाने लगे थे। माइक पर हमारे साथी बोल रहे थे- घटनास्थल पर जाना कठिन है, मगर हम जा रहे हैं, वग़ैरह-वग़ैरह। यही टीवी पत्रकारिता का मज़ा है। हर कठिन परिस्थिति में छोटी-छोटी ख़बर तलाशो। कुछ सेकंड की हो, भले ही एक बार चले, मगर हर वक़्त ख़बर पर भिड़े रहो।

थोड़ी देर बाद ही दुर्घटनास्थल दिखने लगा। रेलगाड़ियों के डिब्बे माचिस के डिब्बों सरीखे पलटे हुए थे, कुछ दाईं तरफ़ तो कुछ बाईं। रेल की मज़बूत पाँतें धागे सरीखी टेढ़ी-मेढ़ी हो गई थीं।

पुल तो नहीं वो नाले की पुलिया थी जिससे तेज़ बहाव का पानी नहीं निकल पाया, तो उसने पुलिया के दोनों तरफ़ की मिट्टी बहाकर रास्ता बना लिया और झूलती पटरियों पर बरसते पानी में दो रेलगाड़ियाँ उतर गईं। मगर दुर्घटना के लिए ज़िम्मेदार जिस पानी की बात की जा रही थी, वो घटनास्थल से तक़रीबन ग़ायब ही था। सैलाब के बाद का कीचड़ और गाद पटरियों की दोनों तरफ़ बहुतायत में थी।

राहत के काम के नाम पर रेल के अधिकारी-कर्मचारी समझने की कोशिश में लगे थे कि काम कहाँ से शुरू करें। रेल दुर्घटना की ख़बर सुन आसपास के गाँवों के हज़ारों तमाशबीन लगातार चले आ रहे थे, जिनको सँभालने का काम रेल पुलिस कर रही थी।

रेल की बोगियों में फँसी लाशें निकालने का काम चल रहा था। कुछ लाशें पानी में बहकर दूर खेतों में भी मिल रही थीं। हादसे के पहले कुछ लोगों ने अपने परिजनों को फ़ोन भी लगाए थे, वो सब भी अपनों की तलाश में भागे-भागे आ रहे थे।

खंडवा में रहने वाले बृजेश सिंह अपने बेटे-बहू की तस्वीर लेकर आए थे। आँसूभरी आँखों से बता रहे थे कि जब डिब्बे में पानी भरा, तो बेटे ने रात साढ़े ग्यारह बजे फ़ोन किया कि पापा, यहाँ से निकालो। खंडवा स्टेशन गया तो अधिकारी ने बताया कि कामायनी का एक्सीडेंट हुआ है, जनता एक्सप्रेस का नहीं। वो लड़ते रहे कि उनका बेटा क्यों झूठ बोलेगा। उन्होंने बेटे और बहू दोनों को बरसात की एक रात में खो दिया।

कामायनी एक्सप्रेस में मालेगाँव के डेढ़ सौ लोग भी थे, जो बनारस जा रहे थे। जब डिब्बे में पानी भरा, तो बुज़ुर्गों के इस दल की एक महिला मथुरा बाई सभी से सँभलने को कह रही थी, मगर जब डिब्बा ज़्यादा तिरछा हुआ, तो सभी के सामने डिब्बे से फिसलकर पानी में जा गिरी।

सबकी आँखों में आँसू भरे थे। दु:ख इस बात का भी था कि तीर्थयात्रियों का पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने का सामान, पैसा सबकुछ डिब्बों में छूट गया था। डरे और दु:खी लोगों के समूह में सभी के चेहरे पर जान बचने का एहसास ही बाक़ी था।

उधर, राहत सामग्री के साथ आई ट्रेन में ही थाना खुल गया था। मरने वालों की शिनाख़्त और पंचनामा भी चल रहा था। पुलिसवाले शव गिन रहे थे – कितने हैं, 24 या 26- अच्छे से गिनो। अभी तो 26 थे, कम कैसे हो गए। यही शव, ख़बर तलाश रहे हम सरीखे ख़बरनवीसों के लिए सबसे बड़ी ख़बर थे। कितने मरे, कितने घायल, इसी आँकड़े से ख़बर बड़ी और छोटी होगी।

वहीं पर सफ़ेद चादरों में लिपटी लाशों के बीच सुबक रहे थे गोटेगांव के नारायण रजक, जिनके परिवार के 11 लोग इस हादसे में जान गँवा बैठे। वो अपने साथ वालों से कह रहे थे कि ज़रा अम्मा के पास खड़े रहो, उनको अकेला मत छोड़ो। उनकी अम्मा सफ़ेद चादर में लिपटी पड़ी थीं। उमरा और हीरापुर गाँव के ये लोग साईं बाबा के दर्शन करने शिर्डी जाने के लिए जनता एक्सप्रेस में चढ़े थे, मगर धूनीवाले बाबा के शहर खंडवा भी नहीं पहुँच पाए।

ख़ैर, जब इन सारे लम्हों को कैमरे में क़ैद कर लिया, तो अब इनको भेजने की उतावली मची। जो रेलगाड़ी आई थी, वो अपनी मर्ज़ी से जाएगी। और टीवी रिपोर्टर को इतना धीरज कहाँ कि गाड़ी के जाने का इंतज़ार करे।

मैं, मुन्ना और अभिषेक दुर्घटना की जगह पर पसरे भारी कीचड़ को पार करते हुए निकल पड़े खिरकिया की ओर अनजान लोगों की मोटर साइकिलों पर सवार होकर। हमें बताया गया था कि वहाँ पर आइडिया का नेटवर्क मिल जाएगा ओर हम अपने लाइव यू से फुटेज भेज पाएँगे। दफ़्तर से फ़ोन पर फ़ोन चले आ रहे थे – फुटेज भेजो, जल्दी भेजो, किसी भी तरह भेजो।

खिरकिया पहुँचते ही हमारी मुश्किल कम होने के बजाय बढ़ गई। भारी बारिश से यहाँ का नेटवर्क भी बंद पड़ा था। इस बीच में राहत की ट्रेन हमारे टीवी के दूसरे दोस्तों को लेकर हरदा रवाना हो गई थी। अब हम यहाँ फँस गए थे। न यहाँ के न वहाँ के!

आनन-फानन में हरदा जाने के लिए गाड़ी की ओर चल पड़े अपनी क़िस्मत को कोसते हुए वापस। मगर क्या मालूम था कि क़िस्मत तो बीच रास्ते में हमारा ही इंतज़ार कर रही थी। अचानक नेटवर्क मिला और गाड़ी रोककर हमने सारा फुटेज मिनटों में भेजा, जो सीधा ऑन एयर था। अब जाकर हमारी जान में जान आई।

मगर ये जानकर आज भी दुख होता है कि तीस लोगों की जान लेने वाले इस हादसे की लापरवाही की ज़िम्मेदारी कोई नहीं उठा रहा। अचानक आई बाढ़ को इसका कारण बताया जा रहा है, मगर रेल पटरियों की निगरानी की अनदेखी की चर्चा कोई नहीं कर रहा। दुर्घटनास्थल के पास दोनों गेटों के फ़ोन भी दो दिन से बंद थे।

तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु दिल्ली से भागकर भोपाल आए और वहीं से लौट गए। यदि वो हरदा तक आते, तो रेल विभाग की लापरवाही को आँखों से देखते।

ज़ाहिर है, जब भी आप रेल में बैठें, तो ऊपरवाले प्रभु के भरोसे ही बैठें।

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(यह अंश लेखक और प्रकाशक की अनुमति से। पुस्तक में ऐसी कुल 75 कहानियाँ हैं।)

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पुस्तक : ऑफ़ द स्क्रीन; टीवी रिपोर्टिंग की कहानियाँ

लेखक : श्री ब्रजेश राजपूत

प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल

मूल्य : 250 रुपए

ख़बरों के पीछे की रोमांचक कहानियाँ

अगर आप टीवी पर न्यूज़ देखते हैं तो इसे पढ़ें और अगर नहीं देखते तो इसे ज़रूर पढ़ें…

वह बारिश का ऐसा ही एक दिन था। आसमान में बादल घिर आए थे, पर बरस नहीं रहे थे। उन दिनों मैं एक दुमंज़िला मकान की लंबी-चौड़ी छत पर बने एकमात्र कमरे में अकेला रहा करता था।

उस दिन दफ़्तर में “विश्व की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ” नामक पुस्तक मेरे हाथ लगी थी और उसे इत्मीनान से पढ़ने की चाह लिए मैं अपेक्षाकृत जल्दी लौट आया था।

किताब दुनियाभर के जाने-माने लेखकों की कहानियों का संकलन थी। चेख़व, मोपासाँ जैसे कुछ नाम जाने-पहचाने थे, तो कुछ नितांत अपिरिचत भी थे। ऐसे ही एक अनजान लेखक की कहानी मैंने बेमन से पढ़नी शुरू की।

कहानी अच्छी थी, उत्सुकता बनाकर चल रही थी, लेकिन… लेकिन असल धमाका हुआ अंत में। उसका अंत इतना अप्रत्याशित था कि मैं कुर्सी से उछल पड़ा। यहाँ “कुर्सी से उछलना” महज़ एक मुहावरा नहीं है, बल्कि मैं वाक़ई उछल पड़ा था और कमरे से बाहर आकर रोमांच और उत्तेजना के मारे छत पर दौड़ रहा था।

वह ओ. हेनरी से मेरी पहली “मुलाक़ात” थी। वह दिन था और आज का दिन है, ओ. हेनरी मेरे सर्वप्रिय लेखक हैं। उनकी किसी कहानी ने मुझे निराश नहीं किया। ज़ाहिर है, वे ऐसे ही दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले तीन लेखकों में शुमार नहीं होते।

इस यादगार मुलाक़ात के बरसों बाद, हाल ही में मेरा परिचय हुआ श्री ब्रजेश राजपूत से। जी हाँ, इस बार भी लेखक से सीधे नहीं, उसकी किताब के माध्यम से मुलाक़ात हुई। और उनकी पुस्तक “ऑफ़ द स्क्रीन; टीवी रिपोर्टिंग की कहानियाँ” पढ़ते हुए मैं एक बार फिर हेनरी की तरह के एहसासों से गुज़रा।

इस बार अंतर सिर्फ़ यह था कि किताब का पहला लेख पढ़ते हुए मैं कुर्सी से चिपक गया। किताब की पहली स्टोरी है- “हरदा से आई हादसे की ख़बर”। यह आधी रात को नदी में ट्रेन गिरने की सूचना से शुरू होती है और टीवी पर इस ख़बर के प्रसारित होने के बाद ख़त्म होती है।

क़रीब चार पृष्ठों के इस लेख में चालीस उतार-चढ़ाव होंगे। दुर्घटना स्थल पर पहुँचने से लेकर रिपोर्ट बनाने और वहीं से भेजने तक की क़वायद में हर पल हालात ऐसे बदलते रहते हैं कि पाठक भी आशा, निराशा, चिंता और सुकून की लहरों में डूबता-उतराता रहता है।

गुणी पत्रकार रशीद क़िदवई कहते हैं कि ब्रजेश के लेखों को पढ़ते हुए आप देखते और सुनते भी हैं। बतौर पाठक मैं कह सकता हूँ कि क़िदवई जी ने बिल्कुल सच कहा है। किताब के 75 में से ज़्यादातर लेख रोमांचक खोज यात्राओं की तरह हैं, जिनमें आप रिपोर्टर के साथ-साथ चलते हैं।

ब्रजेश शब्दों से माहौल का चित्र खींचते हैं, जिसके चलते कभी आप भय के मारे सिहर उठते हैं, कभी भूतों से मुलाक़ात की संभावना मात्र से रोमांच से भर उठते हैं, कभी मौत से सामना होने पर आपकी जान हलक़ में अटक जाती है, तो कभी असहनीय दुर्गंध से गुज़रते हुए आपको उबकाई आने लगती है। कभी-कभी आपका बड़ा सम्मान होता है और कभी लोग आपके सामने ही आपकी बुराई कर रहे होते हैं।

टीवी न्यूज़ की दुनिया में आपका स्वागत है!

वही टीवी न्यूज़, जिसे “घटिया” कहकर हम कई बार नकार देते हैं और चैनल बदलकर “आतंक का गुंडाराज” जैसी किसी दक्षिण भारतीय डब फ़िल्म की तरफ़ बढ़ जाते हैं। मैंने भी लंबे समय से टीवी पर समाचार देखना छोड़ रखा है।

मुझे तो टीवी रिपोर्टरों से और भी ज़्यादा शिकायतें थीं/ हैं। मुझ जैसे हिन्दी-भक्त को टीवी की भ्रष्ट भाषा हज़म ही नहीं होती। इसके अलावा, एक “सौतिया डाह” क़िस्म की चीज़ भी होती है। ख़बरों की दुनिया के ही हिस्से होने के बावजूद प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दो ध्रुवों की तरह हैं। प्रिंट वालों को लगता है कि टीवी वालों का काम नौटंकी की तरह निरर्थक है और टीवी वालों को लगता है कि छपे हुए को आजकल पढ़ता ही कौन है, सो छापना ही व्यर्थ है!

सच कहूँ, तो ज़्यादातर टीवी रिपोर्टर मुझे “बेवकूफ़” लगते थे। ध्यान दें, मैं “हैं” नहीं “थे” कह रहा हूँ। “ऑफ़ द स्क्रीन” पढ़ने के बाद मेरी यह धारणा बदली है। ब्रजेश की लेखनी में दोहराव नहीं है, वे व्यर्थ का विस्तार नहीं करते, अनावश्यक भूमिकाएँ नहीं बाँधते और बिना लाग-लपेट सबकुछ कह देते हैं।

मेरा ख़्याल है कि ब्रजेश “आस्तीक” की तरह हैं। महाभारत ख़त्म होने के बाद, कलियुग के आरंभ में आस्तीक एक ऋषि थे। उनके पिता मानव और माता नागकन्या थीं। जब अर्जुन के प्रपौत्र जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्पयज्ञ करके तक्षक समेत सभी सर्पों का समूल नाश कर देना चाहा, तो आस्तीक ने मध्यस्थ बनकर नागों की रक्षा की थी।

ब्रजेश में भी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों के गुण हैं। उनकी भाषा प्रिंट वाली है, तो शैली टीवी की। वे लेखन में गंभीर टिप्पणियाँ करते हैं, तो उसे टीवी वालों की तरह चुटीला अंदाज़ भी देते हैं। यानी उन्होंने अपने लेखन से न केवल टीवी रिपोर्टरों की छवि को “मटियामेट” होने से बचा लिया है, बल्कि उसे एक हद तक सँवारा भी है।

बहरहाल, “ऑफ़ द स्क्रीन” ने मेरी कुछ और ग़लतफ़हमियाँ भी तोड़ी हैं। ख़ासतौर पर हल्की-फुल्की स्टोरीज़ को लेकर। किताब की एक स्टोरी- “टीवी में नॉन न्यूज़ भी न्यूज़ होती है, ज़रा समझा करो” पढ़कर सचमुच समझ में आया कि निरर्थक लगने वाली ख़बर भी किस तरह पब्लिक डिमांड और ऊपर के दबाव में बनानी पड़ती है और उस आसान-सी स्टोरी के लिए भी कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं।

किताब में नर्मदा में तैरते शिवराज सिंह चौहान हैं और फटी टी-शर्ट वाले “महाराजा” ज्योतिरादित्य सिंधिया भी। इसमें झाड़ियों में फँसी एक नवजात बच्ची की दिल को छू लेने वाली कहानी है, एक चर्चित एक्टिविस्ट का हत्याकांड है और उत्तराखंड की भीषण आपदा भी है। यहाँ चुनावी क़िस्से हैं और अधिकारियों के खटकरम भी। बीच-बीच में कुछ सकारात्मक कहानियाँ भी हैं। आपने अब तक टीवी पर जितनी तरह की न्यूज़ स्टोरीज़ देखी होंगी, लगभग सब इसमें हैं।

मेरी सलाह है कि यदि आप टीवी न्यूज़ देखते हैं, तो इसे पढ़ें… और अगर नहीं देखते, तो इसे ज़रूर पढ़ें। दोनों ही स्थितियों में आपका नज़रिया काफ़ी हद तक बदल जाएगा।

पाठक को बाँधकर रखने के अलावा, यह लेखक की एक और बड़ी ख़ूबी है।

© विवेक गुप्ता

पुस्तक : ऑफ़ द स्क्रीन; टीवी रिपोर्टिंग की कहानियाँ
लेखक : श्री ब्रजेश राजपूत
प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल
मूल्य : 250 रुपए

निकृष्टता के रसातल पर

“मुन्नाभाई एमबीबीएस” वाले फ़िल्मकार ने “संजू” बनाई है। हीरानी के इस सफ़र के लिए ही पतन, अधोगति, गिरावट जैसी संज्ञाएँ हैं।

(यह फ़िल्म नहीं, फ़िल्मकार की समीक्षा है)
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भोपाल की ज्योति टॉकीज के उस अँधियारे में परदे की रोशनी दर्शकों के चेहरों पर पड़ रही थी। पूरा हॉल ठहाकों से गूँज रहा था। लोगों के दाँत चमक रहे थे। परदे पर “थ्री ईडियट्स” का “धन = स्तन” वाला दृश्य चल रहा था।

थोड़ा-बहुत हँस तो मैं भी रहा था, पर मैं कुछ हैरान भी था। कारण यह कि जिस घटिया लतीफ़े पर वह दृश्य आधारित था, उसे मैं पहले तीन-चार बार पढ़ चुका था और मेरा ख़्याल था कि अधिकांश लोगों ने उसे पढ़ रखा होगा। फिर भी लोग पेट पकड़-पकड़कर हँस रहे थे।

…लेकिन सब नहीं। मैंने देखा, मुझसे एक पंक्ति आगे बैठी एक लड़की का सिर झुका हुआ था। उसके आसपास बैठे लोग भी असहज थे। शायद वे एक ही परिवार के थे। और ज़ाहिर है, बलात्कार-चमत्कार, स्तन-धन पर कोई सभ्य व्यक्ति कम-से-कम अपने परिवार के साथ तो नहीं हँस सकता।

फूहड़ हरकतों का महिमामंडन, “तोफ़ा” क़ुबूल हो जैसी अश्लीलता और कचरा साफ़ करने वाले वैक्यूम क्लीनर की मदद से प्रसव कराया जाना… साफ़ था कि हीरानी फ़िल्मी मसालों के चक्कर में फँस गए हैं। इस फ़िल्म के बाद मुझे लग गया कि राजकुमार हीरानी ने अपना शिखर अपनी पहली लोकप्रिय फ़िल्म से छू लिया है और अब उन्हें गिरना ही है। और हुआ भी यही।

“मुन्नाभाई एमबीबीएस” वाले फ़िल्मकार ने “संजू” बनाई है। हीरानी के इस सफ़र के लिए ही पतन, अधोगति, गिरावट जैसी संज्ञाएँ हैं। हीरानी का यह पतन चौंकाता नहीं है, क्योंकि यह अचानक नहीं हुआ है। मुन्नाभाई उनका शिखर था और संजू रसातल। इन दोनों के बीच वे क्रमश: गिरते ही गए हैं।

यह सिनेमाई गुणवत्ता, मनोरंजन की क्षमता, लोकप्रियता और कमाई के बारे में नहीं है। यह तय है कि संजू, मुन्नाभाई से दस गुना पैसे कमाएगी और शायद हज़ार करोड़ का रिकॉर्ड भी तोड़ दे।

यह तो फ़िल्मकार के मानसिक स्तर की बात है। यह तो सुनील दत्त जैसे धर्मात्मा के आवारा, नशेड़ी, शराबी, अय्याश, आतंकवादियों से रिश्ते रखने वाले और सज़ायाफ़्ता अपराधी बेटे के जीवन पर फ़िल्म बनाने के बारे में सोचने की बात है।

मैंने कहीं पढ़ा था कि सुनील दत्त हुसैनी ब्राह्मण थे। सातवीं सदी में भारत के सम्राट हर्षवर्धन ने कर्बला के युद्ध में इमाम हुसैन की सहायता करने के लिए अपने सैनिकों का एक दस्ता रवाना किया था। वह दस्ता समय पर नहीं पहुँच पाया, वरना आज इस्लाम का इतिहास कुछ और होता। उसी दस्ते में शामिल सैनिक के वंशज थे, सुनील दत्त।

मैंने तो यहाँ तक पढ़ा है कि सुनील दत्त ने पत्नी नरगिस की मौत के बाद उन्हें इस्लामिक रीति से दफ़नाया और मुसलमानों से माफ़ी माँगी कि मैंने आपके मज़हब की स्त्री से विवाह करके आप लोगों को दु:ख पहुँचाया।

उस सुनील दत्त की औलाद है संजय दत्त, जिसने एके-56 रखने के बारे में अपने बाप के सवाल पर जवाब दिया था मेरी रग़ों में मुस्लिम ख़ून दौड़ रहा है। मुंबई शहर में जो हो रहा था, उसे मैं बरदाश्त नहीं कर सकता था (संदर्भ : तहलका की स्टोरी, बरास्ते बीबीसी)।

राजकुमार हीरानी ने उसी संजय दत्त की जीवनी बनाई है, जो फ़िल्म में बड़े अहंकार से कह रहा है कि मैं 300 महिलाओं के साथ सोया। संजय की कहानी के ज़रिए हीरानी कौन-सा संदेश देना चाहते हैं? निश्चित तौर पर, यह डाकू के संत बनने की कथा तो नहीं कि कोई प्रेरणा मिले। क्या कोई यक़ीन करता है कि जेल जाने के बाद संजय दत्त सुधर गया है?

यह भी ठीक है कि बॉलीवुड के भांडों ने दाऊद इब्राहीम से लेकर गुजराती डॉन तक को महिमामंडित करते हुए फ़िल्में बनाई हैं। लेकिन सबको पता है कि ऐसी फ़िल्में किसके पैसों से और किस तरह के उद्देश्य से बनाई जाती हैं। हीरानी कम-से-कम उस श्रेणी के तो नहीं हैं।

फिर मेरी जिज्ञासा है कि क्या महज़ संजय दत्त के साथ अपने संबंधों के लिए उन्होंने अपनी अब तक की ख्याति और छवि को दाँव पर लगा दिया है? या फिर वे बहक गए हैं… हालाँकि भटक तो वे पहले ही गए थे…

© विवेक गुप्ता