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शुभारम्भ

यह जानना ज़रूरी है…

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सफलता ‘सफलता’ है, ‘सफ़लता’ नहीं। इसमें फूल (पुष्प) वाला ‘फ’ है, न कि अँग्रेज़ी के फ़ूल (मूर्ख) वाला नुक़्ते सहित ‘फ़’। यानी रोमन लिपि में इसे Saphalta लिखा जाना चाहिए, न कि Safalta।
यह ब्लॉग जीवन की ऐसी ही छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिलाने के लिए है, जो बड़ी मायने रखती हैं।

ये शब्द प्राय: ग़लत लिखे जाते हैं

इन शब्दों को याद कर लीजिए, डायरी में लिखकर रख लीजिए, लिखकर दीवार पर चिपका लीजिए, बीच-बीच में पढ़ते रहिए। ये वे शब्द हैं, जो अक्सर ग़लत लिखे जाते हैं। सही वर्तनी के पीछे जो व्याकरण है, उसे स्वाध्याय से पता कीजिए। लेखक, पत्रकार, शिक्षक और छात्रों को ख़ासतौर पर ऐसी ग़लतियों से बचना ही चाहिए।

सही शब्द कोष्ठक में हैं।

आध्यात्म (अध्यात्म), अध्यात्मिक (आध्यात्मिक), किश्त (क़िस्त), सानिध्य (सान्निध्य), स्त्रोत (उद्‌गम/मूल के संदर्भ में स्रोत; स्तुति के संदर्भ में स्तोत्र), उज्जवल (उज्ज्वल), प्रज्जवल (प्रज्वल), ब्राम्हण (ब्राह्‌मण), ब्रम्ह (ब्रह्‌म), षड़यंत्र (षड्यंत्र), निधी/प्रतिनिधी (निधि/प्रतिनिधि), तिथी/अतिथी (तिथि/अतिथि), सिद्धी (सिद्धि), लिपी (लिपि), दंपत्ति (दंपती), गृहणी (गृहिणी), नर्क (नरक)।

अंतर्ध्यान (अंतर्धान), अनाधिकार/अनाधिकृत (अनधिकार/अनधिकृत), दुरावस्था (दुरवस्था), मिष्ठान्न (मिष्टान्न), शैया (शय्या), प्रमाणिक (प्रामाणिक), पूज्यनीय (पूजनीय/पूज्य), उद्धत (उद्धृत यानी अलग किया हुआ, जैसे किसी लेख या भाषण से ली गई कोई पंक्ति। उद्धत भी एक शब्द है, जिसका अर्थ उत्तेजित, चपल, अक्खड़, अशिष्ट आदि होता है।), उद्दत (उद्‌यत यानी आमादा, तैयार), परिशिष्ठ (परिशिष्ट), आबंटन (आवंटन), तत्कालिक (तात्कालिक), कृतकृत (कृतकृत्य), चेष्ठा (चेष्टा), विरोध के अर्थ में ख़िलाफ़त (मुख़ालिफ़त), आइना (आईना), फ़ेहरिश्त (फ़ेहरिस्त)।

मंत्रीमंडल (मंत्रिमंडल), लब्धप्रतिष्ठित (लब्धप्रतिष्ठ), सन्यास (संन्यास), दृष्टा (द्रष्टा), रविंद्र (रवींद्र), तुष्टिकरण (तुष्टीकरण), उष्मा (ऊष्मा), उर्जा (ऊर्जा), बहु/वधु (बहू/वधू), छठवाँ (छठा), शमशान (श्मशान), अंत्येष्ठि (अंत्येष्टि), नुपुर (नूपुर), निरोग (नीरोग), निहारिका (नीहारिका), व्यवसायिक (व्यावसायिक), ज्योत्सना (ज्योत्स्ना), नगद (नक़द), द्वंद (द्वंद्व), नवरात्रि (नवरात्र), चारागाह (चरागाह), बारात (बरात), श्रृंगार (शृंगार)…

…इसे यहीं समाप्त न मानें, अपनी सूची में शब्द जोड़ते रहें।   

संस्कृत के सहारे हिन्दी

मेरी एक मौसी, जिन्होंने सिर्फ़ आठवीं तक की शिक्षा प्राप्त की है, ने अपनी चिट्‌ठी में ‘निर्निमेष’ शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने अपनी पौत्री की चेष्टाओं का वर्णन करते हुए लिखा था- ‘वह निर्निमेष देखती रहती है।’

मैंने अपनी माता जी से निर्निमेष का अर्थ पूछा, और उन्होंने बता भी दिया। यह मेरे अहंकार के लिए बड़ा झटका था। यह कॉलेज के ज़माने की बात है, जब अपनी छोटी-छोटी योग्यताओं के लिए बड़े-बड़े अहंकार हुआ करते हैं।

मेरे लिए बड़े आश्चर्य की बात थी कि दो घरेलू महिलाएँ वह शब्द जानती और प्रयुक्त करती हैं, जो मैंने कभी पढ़ा नहीं। निर्निमेष का अर्थ होता है, अपलक/एकटक। ‘निमेष’ मतलब पलक झपकना या एक बार पलक झपकने में लगा समय।

हमारे यहाँ (छत्तीसगढ़) में तत्काल, शीघ्र, अधिक जैसे शब्दों का प्रयोग सामान्य है। यदि आप अपने परिवेश पर ध्यान देंगे, तो आपको संस्कृत मूल के ढेर सारे शब्द मिलेंगे, जिन्हें अख़बारी मीडिया के ‘स्वघोषित विद्वान’ क्लिष्ट कहकर नकार देते हैं।

मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था, जब भोपाल की किसी गली में पैदा हुए एक बॉस ने लेख में ‘हृदय’ शब्द देखकर सड़ा-सा मुँह बनाया और उसे काटकर ‘दिल’ कर दिया था।

उन दिनों मैं नया-नया था और ऊपर से उन सज्जन का ख़ौफ़ भी था, इसलिए मैं संस्कृत शब्दों से सचेत रूप से बचने लगा। यहाँ तक कि मेरे अनुभव से सबक़ लेकर टीम के अन्य सदस्यों ने भी ‘आशा’ की जगह ‘उम्मीद’ और ‘अधिक’ के स्थान पर ‘ज़्यादा’ का प्रयोग शुरू कर दिया। हालाँकि बॉस के रुख़सत होते ही हम अपनी स्वाभाविक भाषा पर लौटने लगे।

इस पूरी कथा का सार यह है कि कोई शब्द क्लिष्ट नहीं होता, बशर्ते आप अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करने के लिए जानबूझकर उसका इस्तेमाल न कर रहे हों।

बहरहाल, अपने लेखन और बोलचाल में संस्कृत शब्दों को सहज रूप से क्यों आने देना चाहिए, इसका एक बड़ा कारण भी है।

कुछ अरसा पहले छोटे परदे के एक प्रश्नमंच कार्यक्रम में जब संचालक अमिताभ बच्चन ने जाना कि प्रतिभागी कई भाषाएं जानता है, तो उन्होंने अपने एक लोकप्रिय संवाद को उन भाषाओं में सुनाने का आग्रह किया। प्रतिभागी ने जब तेलुगू, ओड़िया और बांग्ला में ‘…लाइन वहीं से शुरू होती है’ संवाद का अनुवाद किया, तो उसने हर भाषा में ‘शुरू’ के लिए ‘आरंभ’ शब्द का प्रयोग किया। यह है भारतीय भाषाओं में अंतर्निहित एकता।

भारतीय भाषाओं में यह साझा तत्व संस्कृत है, जिसके सहारे हिन्दी ने सारे देश में अपना विस्तार किया है। कुछ विशेषज्ञों का दावा है कि दक्षिण भारत की मलयालम में 70 प्रतिशत और तेलुगू में 60 प्रतिशत तक संस्कृत शब्द हैं।

यहां तक कि तमिल में भी संस्कृत शब्द बड़ी संख्या में हैं। करुणा, जया जैसे नामों से इस तथ्य की पुष्टि तो होती ही है, जब आप कई तमिल शब्दों के अर्थ आसानी से समझ जाते हैं, तो इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता है। उदाहरण के लिए, तमिल भाषा में प्रयुक्त होने वाले ग्रामम्, सुगम्, समाचारम्, मात्रम्, दूरम्, शीग्रम, गर्वम् आडंबरम्, जलम्, अंकुशम् के अर्थ क्या किसी हिन्दीभाषी को समझाए जाने की ज़रूरत है?

बांग्ला, असमिया, मराठी, पंजाबी आदि तमाम भाषाओं में संस्कृत शब्द भरे पड़े हैं। कहने का तात्पर्य यह कि संस्कृत मूल के शब्दों के चलते हिंदी के ‘दुरूह’ हो जाने की बात ग़लतफ़हमी ही है। संस्कृत शब्द आपकी हिंदी को एक बड़े अहिंदीभाषी समुदाय तक पहुँचाते हैं। झिझकें नहीं, अपनी हिन्दी में संस्कृत शब्दों का प्रयोग सहज रूप से करें।

दो शब्द जो अब ‘ग़लत’ हैं, पर पहले कभी सही थे

यदि आप शब्दों की वर्तनी को लेकर जागरूक हैं, तो धूम और स्वादिष्ठ में ‘ग़लती’ पकड़ लेंगे, अन्यथा इन्हें क्रमश: धूम्र और स्वादिष्ट पढ़कर आगे बढ़ जाएँगे।

बहरहाल, दोनों ही स्थितियों में आपको यह जानकारी चौंका सकती है कि मूल (यानी सही) शब्द धूम और स्वादिष्ठ ही हैं, लेकिन अब प्रचलन के अनुसार धूम्र और स्वादिष्ट सही हो गए हैं।

धूम का अर्थ है, धुआँ। यह पुल्लिंग शब्द है। धुआँ उड़ रहा था, धूम फैल रहा था। माता की आरती- ‘धूम विलोचन नयना’ में भी यही धूम है, जिसे धूम्र गाया जाता है।

एक अन्य अर्थ में धूम स्त्रीलिंग है, जो जोर-शोर के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे- धूमधाम। यानी धूम (धूम्र=धुआँ) फैलता है और धूम मचती है।

अब ‘ग़लत’ हो गया एक अन्य सही शब्द है, स्वादिष्ठ। इसमें इष्ठ प्रत्यय लगा है। इष्ठ में श्रेष्ठता और भरपूर होने का भाव है। जैसे- जो बली है वह बलिष्ठ, जो गुरु (भारी) है वह गरिष्ठ, जो श्रेयस् है वह श्रेष्ठ… और इसी तरह जो सुस्वादु है वह स्वादिष्ठ! है न…?

टीप : यह पोस्ट मनोरंजन और ज्ञानवर्द्धन के लिए है। कृपया लेखन और बोलचाल में धूम्र और स्वादिष्ट का ही प्रयोग करें। धूम और स्वादिष्ठ को सौ फ़ीसद ग़लत मान लिए जाने की आशंका है और ज़ाहिर है, आप हर किसी को सफ़ाई भी नहीं दे पाएँगे।

नवरात्रि या नवरात्र…?

शक्ति-आराधना की विशेष नौ रातों को ‘नवरात्र’ कहा जाता है। कई बार इसे ‘नवरात्रि’ लिख दिया जाता है। सही क्या है?

व्याकरण के हिसाब से नवरात्र सही है। नवरात्र, यानी नौ रात्रियों का समूह। यह द्विगु समास है। समास में दो पद होते हैं- पहले वाला पूर्वपद, बाद वाला उत्तरपद। इन दोनों के मेल से बनता है समस्तपद।

द्विगु समास में पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण होता है। जैसे- नवग्रह (नौ ग्रहों का समूह), त्रिलोक (तीन लोक), सप्तसिंधु (सात नदियां)। याद कीजिए, चतुर्णां युगानां समाहारः = चतुर्युगम् (चतुर्युग)। समाहार मतलब बहुत-सी चीज़ों को एकत्र करके मिलाना; इकट्ठा करना; समावेश; संग्रह आदि। ध्यान रहे कि द्विगु समास में समस्तपद समूह का बोध कराता है।

‘दशानन’ में पूर्वपद (दश) संख्यावाचक होने के बावजूद यह द्विगु नहीं, बहुव्रीहि समास है। कारण : इसमें समस्तपद का अर्थ गौण है और उससे मिलने वाला संकेत प्रधान है। जिसके दस मुख हैं, अर्थात ‘रावण’। जहाँ ‘अर्थात’ आ जाए, वह बहुव्रीहि समास।

बात हो रही है नवरात्र और नवरात्रि की। चूंकि नवरात्र शब्द संस्कृत से सीधे-सीधे, पूरा-पूरा हिन्दी में आया है, इसलिए यही सही है।

दूसरी बात, समास करते समय यदि पहला पद संस्कृत का है, तो दूसरा भी उसी भाषा का होगा। जैसे क्रोधाग्नि (क्रोध की आग) को ‘क्रोधाग’ नहीं लिखा जा सकता।

परंतु यहां तो ‘रात्र’ और ‘रात्रि’, दोनों संस्कृत शब्द हैं! ऐसे में, ‘रात्र’ को चुनना इसलिए सही है, क्योंकि यह रात्रि का बहुवचन है। एक से अधिक रात्रियों का समूह। जैसे हिंदी में ‘रात्रियाँ’ है, वैसे ही संस्कृत में ‘रात्र’। अत:, नौ रातों के लिए नवरात्र ही लिखें।

विवेक गुप्ता

टूटन के दौर में जुड़ाव की तलाश

इस बदलते दौर में कहीं कोई पुरुष भी स्त्री के हाथों प्रताड़ित है। एक अक्खड़, अपने पेशे में दुस्साहसी और आज़ादख़्याल मर्द भी बीवी के ताने और उलाहने सुनता है।

इस उपन्यास की पृष्ठभूमि आधुनिक होते हुए भी यह अपने मूल में ठेठ भारतीय है, या कहें कि सहज मानवीय है। घर के बाहर की सारी कामयाबी और घर के भीतर जुटा ली गई तमाम सुविधाओं के बावजूद एक अधूरापन सालता रहता है। एक रिश्ता है- प्रेम, आपसी सम्मान और आज़ादी का रिश्ता- जो इस अधूरेपन को पूर्णता देता है। इसी पूर्णता की तलाश में गुँथा है, ममता कालिया का उपन्यास ‘सपनों की होम डिलिवरी’।

यह तलाश स्त्री और पुरुष, दोनों की है। यह एक संक्रमणकाल की कहानी है। एक तरफ़ स्त्री सफल हो रही है, अपनी स्वतंत्र पहचान बना रही, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी हो रही है, तो दूसरी तरफ़ वह पुरुष के हाथों प्रताड़ित भी है। यहाँ तक कि उसे मान और आजादी की सौगात देने वाला पुरुष भी कभी-कभी अपनी आदिम भूमिका की भूलभुलैया में भटक जाता है। लेकिन ठहरिए! किसी फ़ैसले पर पहुँच जाने से पहले जान लीजिए कि इस बदलते दौर में कहीं कोई पुरुष भी स्त्री के हाथों प्रताड़ित है। एक अक्खड़, अपने पेशे में दुस्साहसी और आज़ादख़्याल मर्द भी बीवी के ताने और उलाहने सुनता है।

ज़ाहिर तौर पर प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही औरत और मर्द की भूमिकाएँ बदल रही हैं। इसी के साथ रिश्तों के ताने-बाने भी बदल रहे हैं- ख़ासतौर पर दांपत्य के रिश्ते के। हालाँकि यह परिवर्तन सहज नहीं है। सीखना दोनों को है। पति को पत्नी की नई छवि स्वीकार करनी है, तो पत्नी को भी अपनी पुरानी छवि का कुछ अंश बरक़रार रखना है। शायद इसी को समझदारी कहते हैं। समझदारी, जो अनुभव से आती है। और अनुभव मिलता है, ठोकर खाने से।

उपन्यास की नायिका रुचि है और नायक सर्वेश। दोनों एक ही धरातल पर खड़े हैं। ठोकर खा चुके हैं। पूर्व में उनके विवाह टूट चुके हैं। इस टूटन के बावजूद वे ख़ुद पूरी तरह नहीं टूटे हैं, बस दरके-से हैं। इसलिए मन के किसी कोने में जुड़ने की आस भी है और तलाश भी। पति की प्रताड़ना ने रुचि को तलाक़ लेने पर मजबूर किया। उसके बाद उसने पाक कला विशेषज्ञ के तौर पर अपनी पहचान बनाई और बैंक बैलेंस भी। दूसरी तरफ़, पत्नी के हाथों बार-बार अपमान झेलने वाले सर्वेश ने भी शादी टूटने के बाद खोजी पत्रकारिता के अपने करियर को ग़ुम नहीं होने दिया।

उपन्यास के इन दो पात्रों के जीवन में समस्याएँ बेशुमार हैं। उनके अपने मानसिक, सामाजिक और आर्थिक संघर्ष हैं। यहाँ तक कि प्रियजनों की मौत भी है। इसके बावजूद उपन्यास का मूल स्वर सकारात्मक है। 90 पृष्ठों में सिमटी इस कथा में घटनाएँ तेज़ी से घटित होती लगती हैं और इसी बीच कहानी वर्तमान और अतीत के गलियारों में चक्कर लगाती रहती है।

स्त्री और पुरुष मनोविज्ञान पर लेखिका की ज़बरदस्त पकड़ है और यही वजह है कि हर पात्र स्वाभाविक लगता है। उपन्यास की रचनाकार संयोग से महिला हैं, लेकिन स्त्री-स्वातंत्र्य का उद्घोष करने के बावजूद यह उपन्यास नारीवाद समेत किसी भी वाद के खाँचे में क़ैद होने से ख़ुद को साफ़ बचा ले जाता है।
यदि एक बहुत पुरानी और काफी घिस चुकी उक्ति के उल्लेख का लोभ सँवरण न करें, तो कह सकते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और इस लिहाज से यह उपन्यास एक साफ़ दर्पण है।

21वीं सदी में रिश्ते भले ही टूट रहे हैं, लेकिन रिश्तों की बचाने की इच्छा अभी ख़त्म नहीं हुई है। यहाँ तक कि रिश्तों को न बचा पाने के बावजूद नए रिश्ते बनाने और उन्हें सँवारने की सहज मानवीय भावना भी अभी बनी हुई है। एक कामयाब, खुद के पैरों पर खड़ी स्त्री भी पुरुष का साथ चाहती है और एक अक्खड़, अहंकारी लगने वाला पुरुष भी भले ही न कहे, लेकिन स्त्री के बग़ैर अपने जीवन को अधूरा तो महसूस करता ही है। आधुनिक स्त्री को चाहिए रिश्ते के भीतर आज़ादी देने वाला पुरुष, तो पुरुष को चाहिए आज़ादी के दायरे से आगे निकलकर बेतरतीब हो चुकी उसकी ज़िंदगी को व्यवस्थित करने वाली स्त्री।

इसीलिए रुचि, सर्वेश को अपना 15 अगस्त कहती है और सर्वेश, रुचि को अपनी 26 जनवरी। यह छोटी-सी प्रयोगधर्मिता ही समूचे उपन्यास का सार है। इसे पढ़ते हुए आप ‘दलिया भरी आलू टिक्की’ बनाना सीख सकते हैं और यह भी जान सकते हैं कि टीवी के कुकरी शो में चीज़ें किस तरह और क्यों जमाई जाती हैं। लेखन की विश्वसनीयता के लिए पात्रों की पृष्ठभूमि के मुताबिक़ जानकारियाँ होना अनिवार्य होता है, तभी पात्र और घटनाएँ स्वाभाविक लगती हैं। इस कसौटी पर भी ममता कालिया जी का लेखन बखूबी खरा उतरता है।

इसे आप एक बैठक में पढ़ सकते हैं- इसलिए नहीं कि इसमें महज 90 पृष्ठ हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि यह प्रवाहमय, रोचक और बोधगम्य रचना है।

(मूलत: नेशनल बुक ट्रस्ट की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘पुस्तक संस्कृति’ के अक्टूबर-दिसंबर 2018 अंक में प्रकाशित)

पुस्तक : सपनों की होम डिलिवरी (उपन्यास)
लेखिका : ममता कालिया
प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन
मूल्य : 99 रुपए (पेपरबैक)

…तब प्रकाशक पैसे देकर छापेगा और लोग पैसे देकर पढ़ेंगे!

इन दिनों सोशल मीडिया मंचों पर प्रकाशकों को ख़ूब गालियाँ पड़ रही हैं। पैसे लेकर छापने और लेखक का शोषण करने के आरोप लग रहे हैं। मैं सोच में पड़ जाता हूँ। क्या वाक़ई प्रकाशक इस दर्जे के शोषक हैं कि बिना पैसे लिए किसी को छापते ही नहीं हैं!

फिर मैं प्रियंका ओम की कहानियों से गुज़रता हूँ। अब धुँध छँट जाती है। अगर रचनाएँ इस श्रेणी की हों, तो कोई भी प्रकाशक पैसे लेकर नहीं, देकर छापेगा और लोग आगे बढ़कर ख़रीदेंगे। ख़रीद ही रहे हैं। “वो अजीब लड़की” और “मुझे तुम्हारे जाने से नफ़रत है”, दोनों ही कहानी-संग्रह बराबर लोकप्रिय हुए हैं और निर्विवाद रूप से बेस्ट सेलर (असली वाले!) हैं।

प्रियंका की सबसे बड़ी ख़ूबी है कि वे चौंकाती हैं। यह चौंकाना ओ.हेनरी की कहानियों की तरह अकल्पनीय अंत के चलते नहीं है। बल्कि, वे अपनी विविधता से चौंकाती हैं। इन संग्रहों की कहानियाँ पढ़ते हुए लगता है कि ये “कहानी-संग्रह” नहीं, “कहानी-संकलन” हैं। (संग्रह और संकलन में व्याकरण की दृष्टि से कोई ख़ास अंतर नहीं है, लेकिन संग्रह एक व्यक्ति की रचनाओं के लिए और संकलन बहुत-से लोगों की रचनाओं के लिए रूढ़ हो चुका है।)

कुछ अरसा पहले श्री सुशोभित सक्तावत के लिए कहा गया था कि लेखकों की एक टीम उनके लिए लिखती है। यह आलोचना नहीं, सबसे बड़ी तारीफ़ है कि लोग यह विश्वास ही न कर पाएँ कि यह सारा कुछ एक ही व्यक्ति के बूते संभव है। तो, “संग्रह” का “संकलन” प्रतीत होना प्रियंका की सबसे बड़ी विशेषता है और पाठकों के लिए एक बड़ा आकर्षण भी।

उनकी लेखन शैली, कथ्य, पृष्ठभूमि और विचारों में इतनी विविधता है कि यक़ीन ही नहीं होता, ये कहानियाँ किसी एक ही लेखक की क़लम से निकली हैं। इनमें ठेठ गाँव के क़िस्से हैं, तो क़स्बे, महानगर और विदेश के भी। कहीं लेखन फिल्मी शैली-सा सरल और पारंपरिक ढर्रे का है, तो कहीं-कहीं बिंबों और प्रतीकों से भरा पड़ा, बिल्कुल नई तरह का।

उनकी किसी कहानी में कोई बिंदास लड़की यौन स्वच्छंदता के विज्ञापन की तरह आती है, तो किसी में एक पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर स्त्री कहती है कि बच्चों की परवरिश और घर-परिवार की देखभाल औरत की सबसे महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है। और आप, यानी पाठक जो हर रचना में लेखक को खोजने के आदी हैं, चक्कर में पड़ जाते हैं कि इनमें से प्रियंका किसे मानें!

तो अंतत: होता यह है कि पाठक अपने सारे पूर्वग्रहों और आग्रहों को त्यागकर, बस कहानियाँ पढ़ता है और उनमें खो जाता है। यह भी किसी लेखक की बड़ी कामयाबी है। जब पाठक, लेखक के बारे में अनुमान नहीं लगाता, तो वह सिर्फ़ कृति पर ध्यान लगाता है, और ज़ाहिर है, कोई भी गंभीर रचनाकार यही चाहता भी है!

“वो अजीब लड़की” और “मुझे तुम्हारे जाने से नफ़रत है”, दोनों ही “लेखिका” की रचनाएँ हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से इनमें स्त्री पात्रों की प्रधानता है। वे बड़ी सबल स्त्रियाँ हैं, पर ऐसा उनके स्त्री होने के कारण ही नहीं है। उन महिला किरदारों की अपनी कमज़ोरियाँ हैं, वे ग़लतियाँ करती हैं, तनाव और दु:ख सहती हैं, सीखती हैं, संघर्ष करती हैं और तब जाकर उबरती हैं या फिर इस क्रूर दुनिया में रहने लायक़ बन पाती हैं। इस लिहाज से, इन कहानियों के पात्र गढ़े गए नहीं, स्वाभाविक रूप से उभरते लगते हैं।

हाँ, इन दोनों किताबों में कुछ सोच-समझकर गढ़ा गया है, तो वह है इनके शीर्षक। कहानियों की स्तरीयता के लिहाज से पुस्तकों के शीर्षक बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं हैं और एक अलग ही और हल्की छवि बनाते हैं। यही बात आवरण चित्रों के लिए भी कही जा सकती है। भले ही व्यावसायिक बिक्री की दृष्टि से ये फ़ायदेमंद रहे हों, पर शीर्षक और आवरण लेखनी के साथ न्याय नहीं करते। एक बात और। प्रियंका का लेखन “बिंदास” और “बेबाक” से कहीं बड़ी चीज़ है। आप इन दो शब्दों के आधार पर किताबें ख़रीदते हैं, तो अच्छी बात है। लेकिन पढ़ते समय कृपा करके बेबाक और बिंदास को अपने दिमाग़ से झटक दें।

बहरहाल, इस पूरी टिप्पणी में मैंने किसी भी कहानी के शीर्षक, पात्र और कथ्य की चर्चा नहीं की है। मैं चाहता हूँ कि आप नितांत अपरिचित के रूप में ये कहानियाँ पढ़ें। मैं अपने युवा लेखक मित्रों से भी कहूँगा कि नए ज़माने का, स्तरीय और साथ ही रोचक लिखना चाहते हों, तो पहले प्रियंका की कहानियाँ पढ़ें।

और आख़िर में आपसे एक सवाल। यदि हृतिक रोशन के एक हाथ में छह उँगलियाँ हैं, तो इससे उनके डांस और अभिनय की गुणवत्ता में कोई कमी आती है क्या? या उनकी फिल्मों से कम मनोरंजन होता है? या एक अतिरिक्त उँगली के चलते पूरी फ़िल्म व्यर्थ हो जाती है? नहीं न…? तो फिर किसी छोटी-मोटी तकनीकी चूक की वजह से पूरी कहानी निरर्थक नहीं हो जाती, न ही किताब डेढ़ सितारी रह जाती है।

मैंने ये दोनों किताबें एक के बाद एक, धड़ाधड़ पढ़ीं। यानी एक किताब ख़त्म होते ही दूसरी पकड़ ली। और मैं दोनों ही किताबें पढ़े जाने की अत्यंत अनुशंसा करता हूँ। अत्यंत अनुशंसा, यानी अँग्रेज़ी में “हाईली रिकमंडेशन”। मेरा यह भी सुझाव है कि आप दोनों किताबें एक साथ ख़रीदें। मेरी नज़र में ये अलग-अलग नहीं, एक यूनिट हैं। इसलिए आप एक बार में 175+140 = 315 रुपए ख़र्च करें। अमेज़ॅन से मँगाएँगे, तो और भी कम लगेंगे और किंडल अनलिमिटेड पर पढ़ेंगे, तो किताबें मुफ़्त में पड़ेंगी।

विवेक गुप्ता

पुस्तक : वो अजीब लड़की, मुझे तुम्हारे जाने से नफ़रत है (दोनों कहानी-संग्रह)
लेखिका : प्रियंका ओम
प्रकाशक : अंजुमन/रेडग्रैब (Anjuman Prakashan)
मूल्य : 140 और 175 रुपए क्रमश:

क्या आप सुखी होने को तैयार हैं?

“सुख की अवस्था पहचान में भी नहीं आती है जबकि दुःख तत्काल समझ में आता है।”

सुखी जीवन जीने के लिए सबसे पहले हमें सुख-दुःख को समझना होगा, उन कारणों की खोज करनी होगी, जिसके कारण सुख-दुःख उत्पन्न होते हैं, फिर उनके निवारण के उपायों को खोजकर उसके अनुसार जीना होगा। ये अध्ययन स्वयं को करना होगा, स्वयं को जाँचना और परखना होगा।
यदि हम दुःख को परिभाषित करने की कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि दुःख ऐसी स्थिति-परिस्थिति है, जिसमें हम अव्यवस्था या अंतर्विरोध में जीने के लिए मजबूर होते है और जो हमें सहज रूप से स्वीकार नहीं होता है। अर्थात् इस अस्वीकृति के भाव से अंतर्विरोध एवं अव्यवस्था में जीने के लिए बाध्य होना ही दुःख है। इसके विपरीत हम जिस भी स्थिति-परिस्थिति में जीते हैं उसमें अनुकूलता है, समरसता है, संगीत है और जैसा जीना हमें सहज स्वीकार्य है अर्थात् इस सहज स्वीकृति के साथ व्यवस्था में, समरसता में जीना ही सुख है। जैसे हम जिस कार्यस्थल पर कार्य करते हैं यदि वहाँ के साथी, कर्मचारी, बॉस या अधीनस्थों से हमारा अंतर्विरोध हो तो हमें हमेशा तनाव बना रहता है। उस कार्यस्थल पर हम घुटन महसूस करते हैं। छुट्टी के अगले दिन कार्यस्थल पर बुझे दिल से जाते हैं, शाम को घर लौटते हैं तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने हमारी पूरी ऊर्जा निचोड़ ली हो। इस व्यवस्था में जीने के लिए मजबूर होने को दुःख कहते हैं।
इसी प्रकार प्रतिकूल परिस्थितियों जैसे स्वयं का या किसी प्रियजन का अस्वस्थ होना, लोगों से संबंध ठीक नहीं चलना, मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाना आदि में रहने के लिए मजबूर होने पर व्यक्ति दुःखी रहता है। इसके विपरीत ऐसी परिस्थितियाँ, जहाँ का माहौल ख़ुशनुमा हो, लोग मिल-जुल कर कार्य करते हों, एक-दूसरे का सम्मान एवं सहयोग करते हों, ऐसी परिस्थितियों में जीने को सुख कहते हैं। ऐसी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियाँ कहीं भी हो सकती हैं। जैसे कार्यस्थल पर, घर में, परिवार में, मोहल्ले में, पड़ोस में, समाज में, सरकार के साथ।
इसी प्रकार प्रत्येक मानव जैसा है और जैसा होना चाहता है, यदि दोनों स्थिति में अनुरूपता (हार्मनी) है, संगीत है, ऐक्य (वननेस) है तो सुखी रहता है और यदि दोनों स्थितियों में अंतर्विरोध है, प्रतिकूलताएँ हैं तो दुःखी होता है। सभी व्यक्तियों की मूल प्रकृति (नेचर) भिन्न-भिन्न होती है परंतु अपनी मूल प्रकृति के विपरीत उसे आचरण करते हुए जीना पड़ता है तो वह दुःखी होता है।
यदि वह दूसरों जैसा बनना चाहता है या करना चाहता है परंतु इच्छा शक्ति के अभाव में वह वैसा बन नहीं पाता है या कर नहीं पाता है तो वह इसके लिए लोगों को, परिस्थितियों को या भाग्य को कोसता रहता है। इस प्रकार वह स्वयं में अंतर्द्वंद्व में फँसा रहता है। इस स्थिति में भी व्यक्ति दुःखी रहता है। अर्थात् जैसा वह होना चाहता है और यदि वह वैसा है, तो सुखी होता है, परंतु जैसा वह होना चाहता है और अभी जैसा है, यदि दोनों में अंतर है तो वह दुःखी होता है।
जीवन में सुखी होने के लिए चार चीज़ों की आवश्यकता होती है। यदि ये चारों चीज़ें हमारे जीवन में होंगी तो हम निश्चित रूप से सुखी रहेंगे और हमारे सुख में निरंतरता भी बनी रहेगी। परंतु इनमें से एक भी चीज़ की कमी होगी तो हमारा सुख बाधित हो जाएगा। ये चीज़ें हैं – समाधान, समृद्धि, अभय और संबंध।
समाधान अर्थात् हमें हमारे सारे प्रश्नों के उत्तर मिल जाए और हमारी सभी परेशानियों-समस्याओं का समाधान हो जाए। द्वितीय, समृद्धि अर्थात् हमारे पास हमारी आवश्यकताओं से अधिक धन-साधन-सुविधा हो। तृतीय, अभय अर्थात् समाज में किसी तरह का भय न हो। चतुर्थ, संबंध अर्थात् हम परिवार तथा समाज में एक दूसरे के साथ पूरक बनकर प्रेमपूर्वक रह सकें। परंतु जब हम जीवन जीते हैं तो इसमें हमें तीन प्रकार की बाध्यताएँ समझ में आती हैं – परिस्थितियाँ, व्यक्ति एवं हमारी मान्यताएँ।

अ. परिस्थितियाँ
प्रत्येक व्यक्ति सुखी रहना ही चाहता है परंतु जब सुखी हो नहीं पाता है तो वह इसके लिए या तो भगवान को दोषी ठहराता है या परिस्थितियों को। इस धरती पर यदि हमने जन्म लिया है तो यहाँ हम अकेले नहीं हैं। हम किसी निर्जन टापू पर पैदा नहीं हुए हैं और ना ही यह हमारे पिताजी की जागीर है कि हम जैसा चाहेंगे केवल वैसा ही होगा।
इस संसार में हमारी हैसियत धूल के कण से भी कम की है। इसलिए हमें इस वास्तविकता को स्वीकारते हुए अपना जीवन जीना होगा। इस प्रकार जब हम इन वास्तविकता के साथ जीते हैं और उनका विस्तार करके देखते हैं तो पाते हैं कि ये परिस्थितियाँ निम्न पाँच स्तरों पर हो सकती हैं। ये स्थिति-परिस्थितियाँ हमारे स्वयं में, परिवार में, समाज में, प्रकृति में और अस्तित्व में पैदा होती हैं। जब हम इन पाँचों स्तरों की स्थितियों-परिस्थितियों के साथ सामंजस्य के साथ व्यवस्था एवं तारतम्य बनाकर सहज रूप से जीते हैं तो हम सुखी हो सकते हैं। इसके विपरीत परिस्थितियाँ होती हैं, जिसमें अव्यवस्थाएँ होती हैं या हमारे लिए प्रतिकूलताएँ होती हैं तो हम दुःखी होते हैं।
सभी मनुष्यों को जीवन में प्रतिदिन छोटी-बड़ी मुश्किलों का सामना करना ही पड़ता है। किसी व्यक्ति पर मुश्किल परिस्थितियों का कितना और कैसा प्रभाव पड़ता हैं, यह उसके नज़रिए पर निर्भर करता है। प्रत्येक व्यक्ति का समस्याओं को देखने का नज़रिया भिन्न-भिन्न होता है। कोई व्यक्ति मुश्किल स्थितियों में भी अविचलित एवं प्रसन्न रहता है जबकि कोई छोटी-छोटी मुश्किलों में भी अपना धैर्य खो देता है या दुःखी हो जाता है।
परिस्थितियों को अलग-अलग चश्मे से देखने के संबंध में ब्रह्मकुमारी के डॉ. गिरीश भाई ने बहुत अच्छी व्याख्या की है। नकारात्मक मानसिकता वाले लोगों द्वारा परिस्थितियों को देखने के नज़रिये के आधार पर निम्न प्रकार के लोग हो सकते हैं:

1. परिस्थितियों को बढ़ा-चढ़ाकर देखना
कुछ लोगों की मानसिकता होती है कि वे छोटी-छोटी घटनाओं को भी बहुत बढ़ा-चढ़ा कर देखते हैं। थोड़ा-सा भी कुछ उनके साथ हो जाए तो पूरा घर या आॅफ़िस सिर पर उठा लेते हैं। वे जिस स्थान पर भी रहते हैं उस स्थान का पूरा माहौल ख़राब कर देते हैं। उनमें बिलकुल भी सहन शक्ति नहीं होती है। ऐसे लोगों में आत्म-विश्वास की कमी होती है।

2. चरम नकारात्मकता
कुछ लोग परिस्थितियों के नकारात्मक परिणामों की चरम स्तर की कल्पना कर लेते हैं। अर्थात् यदि अनुकूल परिणाम नहीं रहेगा तो ज़िंदगी ख़त्म हो जाएगी, सब कुछ समाप्त हो जाएगा, ज़िंदगी नरक बन जाएगी आदि-आदि। ऐसे लोग जल्दी एवं बार-बार डिप्रेशन में चले जाते हैं। ऐसे लोगों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति भी होती है।

3. तत्काल निर्णय पर पहुँचना
कुछ लोगों के साथ यदि कोई छोटी-सी भी बात होती है तो वे तत्काल इस निर्णय पर पहुँच जाते हैं कि निश्चित रूप से ग़लत ही होने वाला होगा। ऐसे लोग हमेशा भयभीत एवं सशंकित रहते हैं। वे हमेशा दूसरे को भी शंका की दृष्टि से देखते हैं कि लोग उनको धोखा देंगे, उनका बुरा करेंगे।

4. हमेशा ‘मैं ही क्यों’सोचना
ऐसे लोगों के साथ जब भी कोई घटना घटित होती है तो उनको लगता है कि ऐसा हमेशा उन्हीं के साथ होता है। वे ही हमेशा बॉस के कोपभाजन बनते हैं, उन्हीं का हमेशा नुक़सान होता है, उन्हें ही हमेशा धोखा मिलता है। उनमें हमेशा पीड़ित होने की भावना बनी रहती है। ऐसे लोग अपनी ग़लतियों की भी ज़िम्मेदारी दूसरों पर डालते हैं। ऐसे लोगों के साथ कभी भी कुछ घटित होता है तो तत्काल दूसरे से तुलना करते हैं, और सोचते हैं कि मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ, दूसरे अन्य के साथ ऐसा क्यों नहीं हुआ। ऐसे लोग अपने से ज़्यादा दूसरे लोगों के बारे में सोचते रहते हैं।

5. लेबलिंग
ऐसे लोग हमेशा पूर्वग्रह से ग्रसित होते हैं। ऐसे लोग स्थानों, परिस्थितियों या दूसरे लोगों के प्रति तत्काल एक प्रकार की धारणा बना लेते हैं फिर उसे हमेशा उसी नज़रिए से देखते हैं। वे छोटी-छोटी घटनाओं के आधार पर अपने पूर्वाग्रह को प्रमाणित करने की कोशिश करते रहते हैं और दूसरों से भी इस बात पर ठप्पा लगवाने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोग अपनी धारणाओं एवं पूर्वाग्रहों को दूसरों पर भी थोपने की कोशिश करते रहते हैं। ऐसे लोगों की सोच बदलना बहुत कठिन होता है।

6. पीड़ित मानसिकता
कुछ लोग अपने आप को दुःखी, पीड़ित या कमज़ोर ही दिखाना पसंद करते हैं। जब भी उनसे मिलें तो हमेशा अपना कोई न कोई दुखड़ा लेकर बैठ जाते हैं। उनके साथ कुछ अच्छा भी हुआ तो उसे कम ही आँकते हैं और दुःखी ही प्रस्तुत होते हैं। ऐसे लोग हमेशा अपना रोना रोते रहते हैं।
इस प्रकार के लोग दूसरों की सांत्वना एवं सहानुभूति के भूखे होते हैं। ऐसे लोग भीड़ में अपना महत्त्व स्थापित करने के लिए भी हमेशा पीड़ित बने रहना चाहते हैं। अन्य कारण यह भी हो सकता है कि ऐसे लोग भयभीत होते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि यदि मैंने अपनी ख़ुशहाली या सफलता प्रकट कर दी तो लोग मेरे खिलाफ़ षड्यंत्र करने लगेंगे या मेरी सफलता या ख़ुशी पर किसी की नज़र लग जाएगी।

7. हमेशा बुरा सोचना
ऐसे लोगों के साथ अच्छा भी घटित होता है तो उसमें से भी कुछ न कुछ बुरा निकाल लेते हैं। ऐसे लोग कभी भी किसी भी अच्छे परिणाम की ख़ुशी नहीं मना पाते हैं, ये लोग हमेशा दुःखी ही रहना पसंद करते हैं। ऐसे लोग हमेशा आशंकाओं में ही जीते हैं।

ब. व्यक्ति
हम हमारी परेशानी एवं दुःखों की ज़िम्मेदारी स्वयं नहीं लेते हैं इसके लिए हमेशा दूसरों को दोष देते रहते हैं। हम इस पृथ्वी पर अकेले नहीं हैं। हमें अन्य लोगों के साथ रहना पड़ता है। इसलिए दूसरे लोग आपको प्रभावित करेंगे ही।
यदि आप फ़ुटबॉल के मैदान में उतरे हैं तो आपके विरोध में 11 खिलाड़ी आपको मिलेंगे ही। विरोधी टीम के खिलाड़ी आपको बॉल लेकर गोल की तरफ़ बढ़ने से रोकेंगे ही, इसके लिए वे आपके साथ कुछ भी कर सकते हैं। यहाँ तक कि आपने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की तो वे आप पर ही गोल चढ़ा देंगे। आपके लक्ष्य या गोल पर एक गोलकीपर भी होगा ही जो आपके द्वारा गोल की तरफ़ फेंकी गई प्रत्येक बॉल को रोकने की कोशिश करेगा ही। यही इस खेल का नियम है। इसलिए निराश होने की आवश्यकता नहीं है। आप अपना सर्वश्रेष्ठ खेल खेलते रहें। आपको इन बाधाओं को पार करके ही गोल करना है अर्थात् लक्ष्य पाना है। आप यह शिकायत नहीं कर सकते हैं कि वे मुझे अपने लक्ष्य की तरफ़ नहीं बढ़ने दे रहे हैं क्योंकि यह खेल आपने चुना है। यदि नहीं खेलना चाहते हैं तो मैदान के बाहर बैठिए। कई ओर लोग खेलने के इंतज़ार में बाहर बैठे हुए हैं।
परंतु यह भी सही है कि 11 खिलाड़ी आपके विरोध में खेल रहे हैं तो 10 खिलाड़ी उनसे मुक़ाबला करने के लिए आपकी ओर से भी खेल रहे हैं। आपके द्वारा बहुत मेहनत से अच्छा खेलने के पश्चात् भी हो सकता है कि साथी खिलाड़ियों का आपको उतना सहयोग नहीं मिल पा रहा हो जितना अपेक्षित था और आप हार जाएँ। यह भी हो सकता है कि आपके किसी साथी खिलाड़ी से ही आत्मघाती गोल हो जाए।
ऐसा ही जीवन है। इसमें रुकावटें, समस्याएँ रहेंगी ही, अच्छा-बुरा होगा ही। जब तक जीवन रूपी मैदान में हैं हमें इनसे होकर गुज़रना ही पड़ेगा। इसके लिए हम किसी दूसरे को दोश नहीं दे सकते हैं। शायद कोई दूसरा भी अपनी समस्या के लिए आपको दोषी ठहरा रहा होगा। ऐसा सभी लोग कर रहे हैं, एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं।
इसी तरह वास्तव में जीवन में भी कुछ लोग हमारे साथ में खड़े हैं और कुछ हमारे विरोध में। लेकिन हमें सभी परिस्थितियों को समझकर ही जीवन को बहुत सहजता से जीना पड़ेगा।
इन व्यवस्थाओं में प्रसन्नतापूर्वक रहने के लिए हमें स्वयं के माध्यम से मानव को समझना होगा। जब हम स्वयं को समझ लेते हैं तो संसार में रहने वाले समस्त मानव भी समझ में आ जाते हैं। इस प्रकार सही समझ से अंतर्द्वंद्व एवं अंतर्विरोध समाप्त हो जाता है और हम सभी सुखी होते हैं।

स. मान्यताएँ
हमारे जीवन को सबसे ज़्यादा प्रभावित हमारी अपनी मान्यताएँ ही करती हैं। हमने हमारे जीवन में बहुत-सी मान्यताएँ बना रखी हैं, जो जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण तय करती हैं और यही दृष्टिकोण हमारे जीवन की दिशा तय करता है। हमारी बहुत-सी मान्यताओं ने हमें जकड़ रखा है जिसके कारण हमारी सोच में संकीर्णता आ गई है जिसके कारण हम परेशान एवं दुःखी रहते हैं।

स्मरणीय बिंदु

  • सुख और दुःख को समझना बहुत ज़रूरी है। दुःख के कारणों को पता कर उनका निवारण करना ही सुखी जीवन की कुंजी है।
  • मनुष्य जैसा होना चाहता है और यदि वह वैसा है, तो सुखी होता है।
  • मनुष्य जैसा होना चाहता है और अभी वह जैसा है, दोनों में अंतर है, तो वह दुःखी होता है।

(पुस्तक यहाँ उपलब्ध है।)