Featured

शुभारम्भ

यह जानना ज़रूरी है…

Advertisements

सफलता ‘सफलता’ है, ‘सफ़लता’ नहीं। इसमें फूल (पुष्प) वाला ‘फ’ है, न कि अँग्रेज़ी के फ़ूल (मूर्ख) वाला नुक़्ते सहित ‘फ़’। यानी रोमन लिपि में इसे Saphalta लिखा जाना चाहिए, न कि Safalta।
यह ब्लॉग जीवन की ऐसी ही छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिलाने के लिए है, जो बड़ी मायने रखती हैं।

सावधान : लोग आपकी एक ग़लती की ताक में रहते हैं…

छात्र जीवन का एक अनुभव, जो बताता है कि लोग स्वार्थ में किस हद तक बेशर्म हो सकते हैं।

वह 14 नवंबर का दिन था। शाला प्रांगण में टहलते हुए मेरी निगाह एक तरफ़ जाकर ठहर गई। वहाँ सामान्य से ज़्यादा भीड़ थी। थोड़ा शोर-शराबा भी हो रहा था।

मैं नवीं कक्षा का छात्र था। हमारे स्कूल में काफ़ी गहमागहमी थी। बाल दिवस पर बच्चों का मेला लगा था। कई स्टॉल थे। कुछ खाने-पीने की चीज़ों के, कुछ गेम्स के।

नीम के पेड़ों के नीचे, उस कोने में भीड़ एक स्टॉल को घेरे हुए थी। वातावरण में थोड़ा तनाव भी पसरा था। मैंने उचककर देखने की कोशिश की। वहाँ एक गेम का स्टॉल था। एक टेबल पर प्लास्टिक के छह गिलास “तीन-दो-एक” के क्रम में एक-के-ऊपर एक जमाए गए थे। तीन बार रबर की गेंद मारकर सभी गिलासों को टेबल से नीचे गिराना था।

यह एक सामान्य गेम था, पर देखने वाले लोगों की संख्या असामान्य थी। मैंने भीड़ के बीच से घुसते हुए सामने की ओर जगह बनाई और खड़ा होकर देखने लगा। गिलासों को गिराने के तीन मौक़े एक रुपए में मिल रहे थे। सफल रहने पर इनाम में शायद दस या 15 रुपए मिलने वाले थे।

यह स्टॉल लगाया था श्री शशांक कर्महे ने, जो तब टेक्निकल स्कूल के छात्र हुआ करते थे। खेलने वाला कोई कॉलेज छात्र था, जो टेक्निकल स्कूल के पास ही रहा करता था। शशांक भैया बदहवास थे। चेहरे पर तनाव था और माथे पर पसीना। पैंट में खोंसी गई शर्ट आधी बाहर निकल चुकी थी। उनकी निगाहें टेबल, गेंद और गिलासों पर बराबर जमी हुई थीं। बीच-बीच में वे भीड़ को पीछे ठेलते, जो मारे उत्सुकता के, टेबल की ओर खिसकती जाती थी।

इस सबकी वजह मुझे कुछ देर से समझ में आई। दरअसल, वह युवक काफ़ी समय से खेल रहा था। हर नाकाम कोशिश के बाद वह पैसे चुका देने के बजाय एक और चांस ले लेता था। जब मैंने देखना शुरू किया, उस समय उस पर 60 रुपए चढ़ चुके थे।

तीन गेंद के हर चांस के बाद शशांक भैया ज़ोर से बकाया रुपए बोलते, ताकि भुगतान के वक़्त कोई विवाद न हो। गिनती बढ़ रही थी। 61…62…66…69…70…71…। खेलने वाले युवक का चेहरा भावहीन दिख रहा था, मानो उसने कोई इरादा कर रखा हो।

उस ज़माने में 70-71 रुपए बड़ी रक़म हुआ करते थे, ख़ासतौर पर किसी स्कूली छात्र के लिए। 50 पैसे में कॉमिक बुक किराए पर मिल जाती थी, 75 पैसे में एक समोसा और 60-70 पैसों में अच्छी पतंग ख़रीदी जा सकती थी। मैं खड़े-खड़े हिसाब लगा रहा था कि शशांक भैया को कितना बड़ा फ़ायदा हो चुका है।

72वें रुपए का गेम शुरू हुआ। युवक ने पहली दो गेंदें फेंकीं। गिलास लुढ़के, पर कुल मिलाकर एक ही गिलास टेबल के नीचे गिर पाया। बाक़ी पाँच अब भी टेबल पर ही थे। अंतिम गेंद बाक़ी थी और कोई चमत्कार ही शेष पाँचों गिलासों को ज़मीन पर गिरा सकता था। युवक 71 बार असफल हो चुका था। 72वीं बार किसी को कोई उम्मीद नहीं थी। तीसरी गेंद फेंकने जा रहे उस युवक को ख़ुद भी न रही होगी।

उसने अनमने ढंग से गेंद फेंकी। वह एक गिलास को लगी। गिलास लुढ़का, पर गिर न पाया। इस बीच गेंद टेबल के किनारे की तरफ़ लुढ़की रही थी। उस तरफ़ कोई गिलास न था। ज़ाहिर है, 72वीं कोशिश भी नाकाम हो चुकी थी।

शशांक भैया ने टेबल पर से गेंद को नीचे गिरने से पहले ही उठा लिया और ज़ोर से चिल्लाए- “72…!!” उन्होंने अगले गेम के लिए गेंद युवक की तरफ़ बढ़ाई। लेकिन युवक ने अपने हाथों को झटक दिया। बोला- “तुमने गेंद टेबल से नीचे गिरने से पहले क्यों उठा ली? तुमने मेरा चांस पूरा नहीं होने दिया। यह फ़ाउल है। मैं तुम्हारे पैसे नहीं दूँगा।”

यह कहकर वह जाने लगा। शशांक भैया ने उसे रोकना चाहा, पर वह हाथ छुड़ाकर, “तुमने फाउल क्यों किया…” कहता हुआ चला गया। शशांक स्तब्ध थे। भीड़ हैरान थी। कानाफूसी बढ़ गई। च्च्च्च की आवाज़ें आ रही थीं। सबकी नज़रों में उस युवक के लिए हिकारत का भाव था, पर वह तो स्कूल गेट से भी बाहर निकल चुका था।

शशांक भैया के साथ धोखा हो चुका था। उनके 72 रुपए मारे जा चुके थे। पिछले डेढ़ घंटे से वे उस अकेले ग्राहक को गेंदें उठा-उठाकर दे रहे थे, वह सारी मेहनत व्यर्थ हो चुकी थी। धीरे-धीरे लोग छँटने लगे। शशांक भैया गेंद हाथ में लिए अकेले खड़े रह गए। मैं भी दूसरी तरफ़ बढ़ गया।

स्कूल में बाल दिवस का मेला हर साल लगता था, आगे भी लगता रहा, पर यह घटना मन पर जैसे छप गई। उस समय मैं इस घटना से सबक़ नहीं ले पाया।

बहुत बाद में जाकर मैंने जाना कि लोग किस तरह अपने इरादों को छुपाए रखते हैं।… किस तरह वे आपकी एक ग़लती की ताक में रहते हैं, ताकि उसकी आड़ में आप पर अपना फ़ैसला थोप सकें।… कैसे स्वार्थ में अंधे लोग न्यायोचित दिखने की चाह भी रखते हैं और इस चक्कर में ख़ुद को नंगा कर लेते हैं।… अगर आप कोई ग़लती नहीं भी करते हैं, तो कैसे वे पूरी बेशर्मी से आप पर ग़लती मढ़ देते हैं।… कैसे वे अपने इरादों को पूरा करने के लिए आपसे ग़लतियाँ करवाते हैं…। कैसे-कैसे-कैसे!!

तो अगर आप लोगों को और उनके छुपे इरादों को पहचानना चाहते हैं… बिना अपराध के दंड नहीं भोगना चाहते हैं, तो 72 रुपए के इस धोखे को हमेशा याद रखें।

विवेक गुप्ता

अगर ज़िंदगी बोझ-सी लगती है… तो यह किताब आपके लिए ही है

सेल्फ़ हेल्प की कुछ किताबें आपकी पिटाई लगाती हैं। अगर आप दिन में 12 घंटे काम नहीं करते, तो आप “आलसी” हैं… अगर आपके रिश्ते ख़राब हैं, तो आप ख़ुद “ज़िम्मेदार” हैं… आपने अपना अब तक का जीवन “व्यर्थ” कर दिया है…। वे किताबें आपको गहरे अपराधबोध से भर देती हैं।

लेकिन “गुब्बारे-सी हल्की है ज़िंदगी” उन सबसे उलट है। यह आपको झकझोरती है, नींद से जगाती है, लेकिन उस तरह जैसे माँ जगाती थीं- “उठो लाल अब आँखें खोलो, पानी लाई हूँ मुँह धो लो…!” हौले से, बड़े प्यार से…। इस पुस्तक को पढ़ते हुए कोमल अनुभूति होती है।

एक बात जो मैं इसके बारे में शर्तिया तौर पर कह सकता हूँ, वह यह कि आप इसे तेज़ी से नहीं पढ़ सकते। मेरे पास हालाँकि किताबों की क़तार है, पर मैं इसे चाहकर भी जल्दी “निबटा” नहीं पाया। यह पाठक को “स्लो” करती है।

दरअसल, हम सभी भाग रहे हैं। सिर पर इच्छाओं, अपेक्षाओं और तुलनाओं की गठरी लिए भागने की कोशिश कर रहे हैं। ज़िंदगी के बोझ बन जाने का यही कारण है। ऐसे में, अगर ज़िंदगी “गुब्बारे-सी हल्की” बनानी है, तो कुछ बोझ कम करने होंगे, कुछ धीमे होना होगा। कैसे…? यह पुस्तक बस इसी बारे में है।

जीवन जीने और उम्र के फ़ासले तय कर लेने में आकाश-पाताल जितना अंतर है। यही फ़र्क़ ख़ुशी और आनंद में है। लेकिन क्या आपने कभी ठहरकर ग़ौर किया है कि ख़ुशी और आनंद, दो अलग एहसास हैं? लेखक श्री प्रवीण कुमार गंगराड़े इसी अंतर पर ध्यान दिलाते हैं।

“सुखानुभूति की अवस्थाएँ” शीर्षक वाले अध्याय में वे लिखते हैं कि सुखानुभूति की चार अवस्थाएँ होती हैं- ख़ुशी, सुख, आनंद और परमानंद। इनके बीच के अंतर को समझने के लिए यह ध्यान देना होगा कि ख़ुशी और सुख के विलोम शब्द तो हैं (ग़म और दु:ख), लेकिन आनंद और परमानंद का कोई विलोम नहीं है।

यानी ग़म और दु:ख न हों, तो आप ख़ुश और सुखी होते हैं। मतलब, ये दोनों हालात, सुविधा, आराम आदि पर निर्भर हैं। लेकिन आनंद और परमानंद आंतरिक अवस्थाएँ हैं। आप कम सुविधाओं में भी आनंद से रह सकते हैं और आलीशान गाड़ी में बैठकर भी दुखी हो सकते हैं।

चौंक गए न…? कितनी सामान्य-सी बात है, पर शायद आपने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं था। यह पुस्तक सहज जीवन से जुड़े ऐसे ही बिंदुओं को सहजता से समझाती है। इसलिए, जब आप पढ़ते हैं, तो दरअसल आप सुनते हैं कि लेखक उन शब्दों को “प्रार्थना” की तरह बुदबुदा रहा है। किताब की हर पंक्ति सुचिंतित और सुविचारित है। आप हर पंक्ति को जज़्ब करते हुए पढ़ते हैं। इसे पढ़ने में वक़्त लगने की यही वजह है।

सुख, आस्था और विचार के साथ ही यह धन, स्वास्थ्य और संबंध (रिश्ते-नाते) की चर्चा भी करती है। आख़िर, आप सबकुछ छोड़-छाड़कर हिमालय तो नहीं निकल सकते, आपको रहना तो इसी संसार में है। और इस संसार में रहने के लिए बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति, अच्छे रिश्ते और आर्थिक निश्चिंतता का होना आवश्यक है। इस तरह यह आपको व्यावहारिक धरातल पर भी रखती है।

बहरहाल, यह मनोरंजन नहीं करती, मनोरंजन के लिए लिखी भी नहीं गई है। यह तो मुँह पर ठंडे पानी के छींटे मारकर जगाती है। इसमें कोई आडंबर नहीं है। लेखक को जैसा महसूस हुआ, उन्होंने लिखा और आपको यक़ीन दिलाने के लिए कोई प्रपंच नहीं किए।

इसलिए जब आप इसे धैर्यपूवर्क, धीरे-धीरे, समझते हुए, गुनते हुए, आत्मसात करते हुए पढ़ते हैं, तो यह ऐसा असर छोड़ सकती है, जो ताज़िंदगी क़ायम रहे और शायद आपकी ज़िंदगी ही बदल दे। जीवन की तरह असीम संभावनाओं से भरी इस पुस्तक को “ग्राहक” नहीं, आपके जैसे “गुणग्राहक” पाठक की तलाश है।

© विवेक गुप्ता

पुस्तक : गुब्बारे-सी हल्की है ज़िंदगी

लेखक : श्री प्रवीण कुमार गंगराड़े

प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल

मूल्य : 195 रुपए

“इंडिया” और “ब्लाइटी” में ज़मीन, आसमान का फ़र्क़ है

पहले मैं जब भी “इंडिया” और “इंडियन” जैसे शब्द सुनता था, तो मेरा ख़ून खौल उठता था कि आख़िर हमें गुलाम बनाने वालों द्वारा दिए गए इन नामों को हमने क्यों इतने गर्व से अपनाया है!

फिर जब श्री संदीप नैयर ने बताया कि हम भारतीयों द्वारा ब्रिटेन को “विलायत” का नाम देने पर अँग्रेज़ भी छोटे स्तर पर ही सही, अपने देश को “ब्लाइटी” कहते हैं, तो दिल को थोड़ी ठंडक मिली।

संदीप लंदन में रहते हैं और अँग्रेज़ी में सारा कामकाज करते हैं। लेकिन वे भारत में अपनी जड़ों और संस्कारों से बराबर जुड़े हुए हैं और हिन्दी भाषा व लेखन की बेहतरी के लिए काम करते हैं।

उन्होंने http://literature.life नामक एक अनूठी और हिन्दी में अपनी तरह की पहली वेबसाइट बनाई है। इस पर हिन्दी लेखकों और पुस्तकों के प्रचार-प्रसार के लिए जानकारियाँ, सूत्र, नए आइडिया, अंतर्दृष्टियाँ, विमर्श, चर्चाएँ और विवाद सहित सबकुछ है।

हिन्दी में लिखने वालों के साथ ही पढ़ने वालों के लिए भी यह वेबसाइट बराबर उपयोगी और रोचक है।

बहरहाल, हिंदी के लिए संदीप की इस सराहनीय पहल और उनकी चौतरफ़ा सक्रियता का प्रशंसक होने के बावजूद, मैं वेबसाइट के अँग्रेज़ी नाम से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता।

उन्होंने इस नामकरण के समर्थन में जिस “हौब्सन-जौब्सन शब्दकोश” का संदर्भ दिया है, उसमें भी देखा जाए, तो अँग्रेज़ी में इस्तेमाल होने वाले तमाम भारतीय शब्द अँग्रेज़ों की ज़ुबान के अनुसार तोड़-मरोड़कर ही लिए गए हैं।

दूसरी तरफ़, हम जिस अँग्रेज़ीकरण का विरोध करते हैं, वह ग्रहण करना न होकर हूबहू नक़ल है, जैसे कि वेबसाइट का नाम http://literature.life

अब हालाँकि वेबसाइट का नाम तो नहीं बदला जा सकता, लेकिन इस बहाने हम हिन्दी में कितनी अँग्रेज़ी हो और किस रूप में हो, इस पर बहस/चर्चा तो कर ही सकते हैं।

आज की मधुरिमा, दैनिक भास्कर के अपने नियमित स्तंभ “अपनी हिन्दी” में मैंने हौब्सन-जौब्सन के बहाने इसी महत्वपूर्ण मुद्दे का एक पहलू सामने रखा है।

क्या आपके पास कोई दूसरा पक्ष भी है…?
——————————-
अपनी हिन्दी
हौब्सन-जौब्सन के बहाने

ब्रिटेन में बसे प्रवासी भारतीय लेखक श्री संदीप नैयर भाषाओं के बीच खुले दिल से शब्दों का आदान-प्रदान होने के हिमायती हैं। वे इस संबंध में एक रोचक जानकारी देते हैं कि अँग्रेज़ी में भारतीय मूल के इतने सारे शब्द शामिल हो चुके हैं कि उनके लिए अलग से, “हौब्सन-जौब्सन” नामक एक पूरा-पूरा शब्दकोश समर्पित है।

नैयर ‘इंडिया इंक’ नामक अँग्रेज़ी नाटक का संवाद उद्धृत करते हैं। इस एक वाक्य में ही भारतीय मूल के ढेर सारे शब्द हैं- “आई वाज बाइंग चटनी इन द बाज़ार वेन ए ठग हू हैड एस्केप्ड फ्रॉम द चौकी रैन अमोक एंड किल्ड ए बॉक्सवाला फॉर हिज लूट क्रिएटिंग ए हल्लाबलू एंड लैंडिंग हिमसेल्फ इन द मलागटानी (भारतीय मसालों से बना चिकन सूप)।” इसी तरह, अँग्रेज़ी में भारतीयों द्वारा गढ़े गए कुछ शब्द भी आधिकारिक तौर पर शामिल कर लिए गए हैं, जैसे- ईव टीज़िंग और प्रीपोन।

जाहिर है, शाब्दिक आदान-प्रदान से भाषाएँ समृद्ध ही होती हैं। हिंदी ने भी संस्कृत की आधारभूमि पर अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, पुर्तग़ाली, तुर्की, मराठी, गुजराती, तेलुगू, बांग्ला, पंजाबी आदि तमाम भाषाओं के शब्दों को बड़े प्रेम से अपनाया है। लेकिन यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि यह “ग्रहण” ज़बरदस्ती नहीं, सहज रूप से होता है। इस प्रक्रिया में स्थानीय शैली के हिसाब से बाहरी शब्दों का स्वरूप बदलता है, उनका अर्थ विस्तारित या संकुचित होता है या फिर उन्हें एक नया अर्थ भी मिल सकता है। जैसा कि नैयर बताते हैं, भदेस अँग्रेज़ी में प्रयुक्त होने वाला “ब्लाइटी” शब्द इसकी मिसाल है। हम अँग्रेज़ों के देश को “विलायत” कहते थे, तो वे भी कहने लगे, जो कालांतर में “ब्लाइटी” हो गया है।

तात्पर्य यह कि भाषा को बिगाड़ने वाले योजनाबद्ध अँग्रेज़ीकरण का विरोध तो हो, पर सहजता से शामिल होने वाले शब्दों का नहीं।

एक डॉक्टर, जो सास-बहू को प्यार से रहने की सलाह देता है

“सोचिए और स्वस्थ रहिए” का हर अध्याय अपने आप में परिपूर्ण है और यही वजह है कि यह उन चुनिंदा पुस्तकों में शामिल है, जिन्हें आप कहीं से भी पढ़ना शुरू कर सकते हैं और कभी भी, कितनी बार भी पढ़ सकते हैं।

पिछले तीन-चार दिनों से गाड़ी चलाने में परेशानी हो रही थी। लग रहा था कि पिछले पहिए में हवा का दबाव काफ़ी कम हो गया है। इसके चलते महसूस हो रहा था कि गाड़ी चलते वक़्त लहरा रही है। मन में चिंता भी लगी थी कि कम हवा के चलते कहीं नया टायर ख़राब न हो जाए या ट्यूब कट न जाए।

संयोग कह लें या आलस्य, इस बीच हवा भरवा भी नहीं पाया। आख़िर, जब लगने लगा कि अब तो गाड़ी कुछ ज़्यादा ही लहरा रही है, तो झख मारकर मैकेनिक के पास गया। उसने हवा भरने से पहले पिछले पहिए में उसका दबाव जाँचा, अगले पहिए में भी जाँचा, फिर “दोनों चक्कों में हवा तो ठीक है” कहकर अगले वाहन की तरफ़ बढ़ गया।

मैंने भी गाड़ी स्टार्ट की और अपनी राह हो लिया। अब न तो हवा कम लग रही थी, न गाड़ी लहरा रही थी। टायर-ट्यूब ख़राब होने की चिंता का तो सवाल ही नहीं उठता था।

अब वाहन चलाने का अनुभव बदल गया था, हालाँकि वाहन में कोई बदलाव नहीं हुआ था। तो आख़िर बदला क्या था?

मेरा मन, मेरे विचार, मेरी सोच। पहले आशंका सता रही थी, इसलिए गड़बड़ी के सारे लक्षण नज़र आ रहे थे। पर अब निश्चिंतता थी। डॉ. अबरार मुल्तानी की पुस्तक “सोचिए और स्वस्थ रहिए” इसी सोच की बात करती है।

पहले रोगों को शारीरिक और मानसिक के खाँचों में बाँटा जाता था, लेकिन अब लगभग सभी रोग मनोदैहिक (Psychosomatic) माने जाते हैं। यानी खुजली से लेकर कैंसर तक, रोगों की जड़ मन में होती है।

इसीलिए, डॉ. मुल्तानी प्लूटो की इस बात को आदर्श मानते हैं कि डॉक्टर सबसे बड़ी भूल यह करता है कि वह मन का इलाज किए बग़ैर सिर्फ़ शरीर का इलाज करता है, जबकि मन और शरीर आपस में जुड़े हुए हैं और उनका अलग-अलग इलाज नहीं किया जाना चाहिए।

ज़ाहिर है, मस्तिष्क में रसायनों की गड़बड़ी का इलाज दवाओं के बल पर हो जाए, लेकिन मन तो अच्छे विचारों से ही चंगा हो सकता है। मन से ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध, स्वार्थ, कुंठा, भय और निराशा जैसे भावों को हटाकर उसमें प्रेम, शांति, सहयोग, दान और आशा जैसे भावों को भरना ही एकमात्र उपाय है।

इन्हीं सबको समर्पित अलग-अलग अध्यायों में लेखक ने उपयोगी उद्धरणों और प्रेरक प्रसंगों के नगीने टाँके हैं। उन्होंने बड़े जतन से दुनियाभर की कई चर्चित किताबों के प्रासंगिक अंश भी सँजोए हैं। इन सबके साथ बतौर चिकित्सक डॉ. मुल्तानी के अनुभव सोने पर सुहागा की तरह हैं।

यह पुस्तक जिस तरह व्यवस्थित और योजनाबद्ध ढंग से रची गई है, वह मुझे शिव खेड़ा की लोकप्रिय पुस्तक “जीत आपकी” की याद दिलाती है, जिसने एक धमाके के साथ भारत में प्रेरणादायक पुस्तकों का बड़ा बाज़ार तैयार किया था।

इस सुगठन के चलते “सोचिए और स्वस्थ रहिए” का हर अध्याय अपने आप में परिपूर्ण है और यही वजह है कि यह उन चुनिंदा पुस्तकों में शामिल है, जिन्हें आप कहीं से भी पढ़ना शुरू कर सकते हैं और कभी भी, कितनी बार भी पढ़ सकते हैं।

डॉ. मुल्तानी आयुर्वेद विशेषज्ञ हैं और उनका पाला हर तरह के रोगी से पड़ता ही होगा। ऐसे में, किसी भी डॉक्टर के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण होता है कि वह रोगियों को अपने उपचार के बारे में यक़ीन दिला सके और उन्हें उपचार लेने के लिए राज़ी कर सके।

लेखक की यह कला किताब में भी नज़र आती है। जैसा कि उन्होंने लिखा है, पुनर्जन्म को न मानने वाले इस्लाम के अनुयायी एक रोगी के लिए उन्होंने इसकी नई व्याख्या की और उसे पुरानी बातों को भुलाकर आज से “नई ज़िंदगी” जीने को कहा।

पुस्तक में उन्होंने मन के भीतर विचारों को सुधारने के साथ ही आस-पास के माहौल को बेहतर बनाने के सुझाव भी दिए हैं, क्योंकि हमारा मन सबसे ज़्यादा परिवेश से ही प्रभावित होता है। परिवेश, यानी मुख्यत: घर। यदि परिवार के सदस्यों से आपके संबंध अच्छे न हों, तो सारे संसार का साम्राज्य भी आपको ख़ुशी/ सेहत नहीं दे सकता।

इसीलिए वे दवा देने वाले चिकित्सक से आगे बढ़कर “सलाहकार” की भूमिका में आते हैं और माता-पिता, बच्चों से अच्छे संबंधों के साथ-साथ सास-बहू के बीच निबाह के सूत्र भी देते हैं। उन्होंने अपने शरीर के अंगों से बात करने, उनसे प्रेम का इज़हार करने की सलाह भी दी है।

“सोचिए और स्वस्थ रहिए” के 270 पृष्ठ बड़े इत्मीनान से यही सब बताते हैं। कहते हैं कि बीमार के लिए अच्छे विचार भी ज़रूरी हैं। इस लिहाज़ से यह किताब अपने आप में एक “अच्छी दवा” की तरह है।

© विवेक गुप्ता

पुस्तक : सोचिए और स्वस्थ रहिए
लेखक : डॉ. अबरार मुल्तानी
प्रकाशक : Manjul Publishing House
मूल्य : 195 रुपए

कैंसर की क्रूरता से बढ़कर, आत्मीयता का आख्यान

रात साढ़े आठ बजे मैंने इस किताब को पलटना शुरू किया। जैसा कि मैं हर नई पुस्तक के साथ करता हूँ, बीच-बीच के कुछ पन्ने पढ़े और यह अंदाज़ा लगाने की कोशिश की कि यह कैसी है।

इसके बाद मैंने खाना खाया और फिर सवा नौ बजे किताब लेकर बैठ गया। हालाँकि मेरे हाथ में कुछ काम था, पर मन कह रहा था कि पहले कुछ पन्ने पढ़ ले।

आख़िर, किताब मेरे हाथों से छूटी रात 12:38 मिनट पर, जब मैंने इसका आख़िरी, 118वां पृष्ठ पढ़ लिया। यह हाथों से तो छूट गई, लेकिन मन से नहीं छूट पा रही है, जहाँ किसी कोने में यह अपनी जगह बना गई है।

अमूमन ऐसा “रोचक” पुस्तकों के साथ होता है। छात्र जीवन में मैंने प्रेमचंद का उपन्यास “ग़बन” एक सिटिंग में पढ़ा था। यहाँ तक कि बीच में बिजली गुल हो गई, तो मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ता रहा था।

लेकिन श्री सुधीर मोता की इस पुस्तक को रोचक कहना “क्रूरता” होगी। यह “दुस्साहस” मैं नहीं कर सकता। हालाँकि इतना अवश्य कहूँगा कि कैंसर जैसे भयावह रोग से जुड़े अनुभवों पर बुनी गई यह पुस्तक बड़ी सरल और तरल है।

“उसका कैंसर, मेरा कैंसर” को पढ़ते हुए आप उससे जुड़ जाते हैं, उसमें शामिल हो जाते हैं। लेखक और उनकी धर्मपत्नी की तकलीफ़ और दु:ख को महसूस करते हैं। आप उपचार के दौरान बँधने वाली उनकी उम्मीदों को लेकर ख़ुश होते हैं।

जैसा कि शीर्षक से ज़ाहिर है, यह पुस्तक कैंसर के इर्द-गिर्द है, लेकिन यह महज़ दु:ख की दास्तान नहीं है। बल्कि यह हौसला, आशा, प्रेम, साथ, और सबसे बढ़कर, भारतीय परिवारों में रिश्तों की गहराई और आत्मीयता का आख्यान है।

श्री मोता जैन समाज से नाता रखते हैं। मैं रिश्तों को निभाए जाने के मामले में हमेशा से इस समाज का प्रशंसक रहा हूँ। मैं बचपन से प्रत्यक्षदर्शी गवाह हूँ कि कैसे जैन परिवारों में दूर-दूर के रिश्तों को भी भरपूर स्नेह और पारिवारिक सदस्य की तरह ही अधिकार मिलते हैं।

अपनी किताब में लेखक बताते हैं कि परिवार में एक सदस्य की बीमारी का पता चलते ही किस प्रकार हर किसी की पहली प्राथमिकता उसका साथ देना, सेवा करना हो जाती है। मुंबई में रहने वाले बेटा-बहू, बीमार माँ के लिए अपना कमरा ख़ाली कर देते हैं और ख़ुद बैठक में डेरा जमा लेते हैं, छोटा बेटा अपने जमे-जमाए कॅरिअर को छोड़कर भोपाल आ जाता है, देवरानी दौड़कर मुंबई पहुँच जाती है, बहू अपनी नौकरी के साथ सास की सेवा में जुट जाती है, और इसी तरह हर सदस्य बिना कुछ बोले अपनी ज़िम्मेदारियाँ सँभाल लेता है। एक बीमार व्यक्ति के लिए दवाओं से ज़्यादा असरदार होती है यह आत्मीयता और सेवा।

इन सबके बीच पति, लेखक है, जो शायद कैंसरग्रस्त पत्नी से अधिक पीड़ा भोग रहा है। वह हर पल पत्नी के साथ है, लेकिन उसके भावुक मन में तूफ़ान उठा हुआ है। कभी वह ख़ुद को दोषी मानता है, कभी अपने “पापों” को याद करता है, कभी अपनी असहायता पर रोता है और फिर ख़ुद को सांत्वना भी देता है।

यह रचना निजी डायरी की तरह है, लेकिन निजी प्रलाप नहीं है। लेखक ने कैंसर से जुड़े तमाम पहलुओं के साथ एहसासों और यादों को गूँथा है। इसके केंद्र में पत्नी का रोग ही है, लेकिन बीच-बीच में दांपत्य की सुखद यादें, रिश्तों के स्नेहिल प्रसंग और अन्य बातें भी आती रहती हैं।

कवि-हृदय लेखक का गद्य कई जगह भावनाओं की तीव्रता के लिहाज़ से कविता की अनुभूति कराता है। श्री मोता पाप-पुण्य की विवेचना करते हैं, दु:ख के क्षणों में धर्म-अध्यात्म से मिलने वाले संबल की चर्चा करते हैं, तो रोग को लेकर सामाजिक नज़रिए, इसकी उपचार विधियों, दवाओं और प्रक्रियाओं के बारे में व्यावहारिक जानकारियाँ भी देते हैं।

किताब होली से शुरू होती है और होली पर जाकर ही ख़त्म होती है। ठीक वैसे ही, जैसे जन्म और मृत्यु के बीच के “कोष्ठक” में ही सबकुछ होता है। इसे जीने का नाम ही ज़िंदगी है। एक मारक रोग से जुड़े अनुभवों पर यह किताब, दरअसल, जीना सिखाती है।

© विवेक गुप्ता

पुस्तक : उसका कैंसर, मेरा कैंसर
लेखक : श्री सुधीर मोता
प्रकाशक : सर्वत्र (Manjul Publishing House का इम्प्रिंट)
मूल्य : 150 रुपए

मेरी खजुराहो यात्रा, मोदी की विदेश यात्राएँ और दिल्ली की, दिल से लिखी गई दास्तान

मीराकांत की “हमआवाज़ दिल्लियाँ” (हिन्द युग्म प्रकाशन) एक रोचक किताब है, जो काफ़ी रिसर्च करके लिखी गई है।

इस बात को एक दर्जन साल से ज़्यादा हो गए हैं। हिन्दी दैनिक “नवभारत” में अपने कार्यकाल के दौरान मुझे खजुराहो नृत्य समारोह की रिपोर्टिंग का अवसर मिला था। उस साल हेमामालिनी के साथ उनकी दोनों बेटियों- ऐशा और आहना (या अहाना) ने भी प्रस्तुतियाँ दी थीं।

खजुराहो के जगत प्रसिद्ध मंदिरों की पृष्ठभूमि में, मुक्ताकाश मंच पर, बेहतरीन प्रकाश व्यवस्था के बीच रोज़ रात को शास्त्रीय नृत्यों की मनमोहक प्रस्तुतियाँ होती थीं। एक पत्रकार के तौर पर मेरे ठहरने, खाने-पीने की सरकारी व्यवस्था थी और समारोह स्थल पर आगे की कुर्सी आरक्षित होती थी (कृपया “पीने” का अर्थ यहाँ पानी ही समझिए)। किसी को और क्या चाहिए!

बावजूद इसके मैं देश की बेहतरीन नृत्यांगनाओं के उतने ही शानदार कला-प्रदर्शन का पूरा-पूरा आनंद नहीं ले पाया। क्यों? क्योंकि मुझ पर रिपोर्ट भेजने की ज़िम्मेदारी भी होती थी। मेरे दिमाग़ में पूरे समय रिपोर्ट ही चलती रहती थी, यानी क्या-क्या लिखना है और फिर कैसे जल्दी से फैक्स के जरिए भेजना है।

जब लोग उपहास से ये कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेशों में घूम रहे हैं, तो मैं विभिन्न आयोजनों, बैठकों, मुलाक़ातों, संबोधनों, चर्चाओं और हज़ारों किलोमीटर की यात्राओं से भरे उनके बेहद व्यस्त शेड्यूल को देखता हूँ और खजुराहो के अपने अनुभव को याद करता हूँ।

ख़ैर, तब से यह तमन्ना है कि एक बार, बग़ैर किसी ज़िम्मेदारी के, बस आनंद लेने के लिए खजुराहो नृत्य समारोह में शामिल होऊँ।

किताबों के साथ भी ऐसा ही है। मुझे उनसे प्रेम है। इस संदर्भ में आप मुझे ख़ुशक़िस्मत मान सकते हैं कि मैं कई किताबों को छपकर उनके बाज़ार में आने से पहले ही पढ़ लेता हूँ। लेकिन ठहरिए!! यह एक ख़ास बात तो है, लेकिन उतनी “मनोरंजक” भी नहीं है।

प्रकाशन-पूर्व पढ़ लेने के अवसर के साथ एक ज़िम्मेदारी भी जुड़ी होती है। वर्तनी और व्याकरण की भूलों को सुधारकर और संपादित करके किताब को बेहतर रूप देने की ज़िम्मेदारी। कभी किसी किताब में बहुत गड़बड़ियाँ होती हैं, कभी किसी में अत्यंत कम। दोनों ही स्थितियों में चौकस रहना पड़ता है। कम भूलों वाली किताब पर काम करते हुए कुछ ज़्यादा ही ध्यान केंद्रित रखना पड़ता है।

जैसा कि आप जानते हैं, जिस क्षण दिमाग़ अलर्ट हो जाता है, मनोरंजन की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है। सोचिए कि इन हालात में भी कोई किताब पढ़ने का आनंद दे जाए और अंत में एक संतुष्टि के एहसास के साथ छोड़ जाए, तो वह कैसी होगी!

मीराकांत की “हमआवाज़ दिल्लियाँ” (हिन्द युग्म प्रकाशन) ऐसी ही किताब है। क़ायदे से तो इतनी बड़ी भूमिका के बाद पुस्तक का नाम लिख देना ही पर्याप्त है। लेकिन मुझे इसके बारे में और भी बताना ज़रूरी लग रहा है।

मीराकांत पुरानी और पुरस्कृत लेखिका हैं, हालाँकि मैंने इसके पहले उनका नाम नहीं सुना था (यह मेरी कमी है)। किताब पढ़ते हुए मैं तो दरअसल, यह भी नहीं जानता था कि वे लेखक हैं या लेखिका (फिर से, यह मेरी ही कमी है)। पर यह एक तरह से अच्छा ही है, क्योंकि मैंने उनके नाम से प्रभावित हुए बग़ैर, उन्हें केवल उनके लेखन से जाना।

…तो “हमआवाज़ दिल्लियाँ” आज़ादी के कुछ पहले तक, दिल्ली की पृष्ठभूमि में लगभग सौ साल की दास्तान है। इसमें इश्क़ है, ख़ानदानी दुश्मनी है, अँग्रेज़ सरकार और उसके पिट्‌ठुओं की चालें हैं, आज़ादी की लड़ाई है, सांप्रदायिकता की ज़मीन है और उस पर खिलते सेकुलरिज़्म के फूल भी हैं।

इसके साथ ऐतिहासिक दिल्ली की शब्दों में खींची गई तस्वीरें हैं, रहन-सहन है, सामाजिकता, रिश्ते और मीठी बोलियाँ हैं। किताब की भाषा हिंदी और उर्दू का मिश्रण है, जिसमें उर्दू ज़्यादा घुली है। इस उर्दू में कोमलता और माधुर्य है और आमतौर पर यह सहज ग्राह्य भी है।

और एक ज़रूरी बात : किताब का जैसा विस्तार है, तीन पीढ़ियों में पसरी अनेक कथाएँ हैं, उस लिहाज़ से 115 रुपए क़ीमत (शुरुआती छूट के साथ) बिलकुल वाजिब है, बल्कि कम ही है।

अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात : यह पुस्तक समीक्षा नहीं है, बतौर पाठक मेरे अनुभव हैं। अगर कुछ भी पढ़ने के पीछे पढ़ने का आनंद लेना आपकी पहली प्राथमिकता में होता है, तो मुमकिन है कि आपके अनुभव भी ऐसे ही हों।

आप नेक हैं, दुष्ट नहीं बन सकते, तो फिर इस स्वार्थी दुनिया में क्या कर सकते हैं…?

रॉबर्ट ग्रीन की पुस्तक “शक्ति के 48 नियम” की तरह यह सीधे “गाइड” नहीं करती। यानी ये नहीं बताती कि क्या करना है। इसके बजाय यह मैकियावेली के सिद्धांतों से परिचित कराके शेष आपके विवेक पर छोड़ देती है।

कभी-कभी निराशा के क्षणों में लगता है कि क्रूरता और स्वार्थ से भरी इस दुनिया में नेक होना कोई अपराध है। जब लोग अहंकार, झूठ, फ़रेब, षड्यंत्र और निर्दयता के बल पर जीतते, बढ़ते, फलते-फूलते नज़र आते हैं, तो नेकनीयती और भलाई अवगुण की तरह लगने लगती हैं।

मन करता है कि नैतिकता-अनैतिकता और पाप-पुण्य के तमाम मानकों को दरकिनार करके दुष्ट बन जाया जाए। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। आख़िर सहज प्रवृत्ति भी कोई चीज़ होती है! हिरण कितनी भी कोशिश कर ले, भेड़िया नहीं हो सकता!

ऐसे में हताशा और भी बढ़ जाती है और कुंठा का रूप ले लेती है। व्यक्ति भीषण तरीक़े से आलोचनात्मक हो जाता है और कोसने को ही अपना धर्म बना लेता है। प्रश्न उठता है कि क्या नेक व्यक्ति की यही नियति है? क्या हिरण हर पल भयभीत रहने, हारने और शिकार होने के लिए अभिशप्त है? क्या ईश्वर ने नेक व्यक्ति को केवल हारने के लिए भेजा है?

तब हाथ लगती है पवन चौधरी की किताब- “मैकियावली; नेक व्यक्तियों के लिए”

किताब का शीर्षक चौंकाता है। लगता है कि लेखक से कोई ग़लती हो गई है। मैंने छात्र जीवन में मैकियावली को पढ़ा है। तब लगता था कि यह कैसा आदमी है, जो अपना राज्य बचाने के लिए हद दर्जे के स्वार्थ, साज़िश और निर्दयता की भी वकालत करता है! नेक व्यक्तियों के लिए भला ऐसे शख़्स का क्या काम?

लेकिन किताब की प्रस्तावना बताती है कि मैकियावेली के सिद्धांतों के बारे में जानना क्यों ज़रूरी है। इसका सूत्र वाक्य है- “बुराई पर विजय पाने के लिए बुराई को समझें।” यदि आपको लगता है कि आप इस जंगल रूपी दुनिया में हिरण हैं, तो बचने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि भेड़िया, चीता, सियार जैसे हिंसक प्राणी शिकार के लिए किन रणनीतियों और तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं।

आपको ख़ुद भेड़िया नहीं बनना है, लेकिन उसके वार को निष्फल तो करना ही है। आप लोगों का शिकार नहीं करना चाहते, न करें। लेकिन ख़ुद शिकार होने से तो बचें।

आपका नेक और भला होना अच्छी बात है, दुनिया को आपकी ज़रूरत है, लेकिन भलमनसाहत को अपनी कमज़ोरी न बनने दें, जैसा कि ऑस्कर वाइल्ड कहते हैं- “मेरे मन में उन लोगों के लिए कोई सहानुभूति नहीं जो नेक हैं लेकिन पराजित होते हैं, क्योंकि एक अच्छा लेकिन हारा हुआ व्यक्ति अच्छाई का सबसे बुरा विज्ञापन होता है- उसकी दशा को देखकर दूसरे लोग अच्छा व्यक्ति बनने से क़तराते हैं।”

बहरहाल, पुस्तक राजा, यानी शासक को दी गई मैकियावली की सलाह के बारे में बताती है। सदियाँ बीत गईं, पर दुनिया मूलत: वैसी ही है। पहले युद्ध के मैदान में मारकाट होती थी, अब सबकुछ परदे के पीछे होता है।

पुस्तक के छोटे-छोटे अध्यायों में मैकियावेली के सुझाव हैं कि विभिन्न परिस्थितियों में व्यक्ति को क्या करना चाहिए। आपको इन्हें समझकर आज के जीवन और परिस्थितियों से उनकी तुलना करनी पड़ेगी। लेखक ने सिद्धांत और सुझाव तो बताए हैं, पर आम आदमी के संदर्भ में उनकी बहुत ज़्यादा व्याख्या नहीं की है।

रॉबर्ट ग्रीन की पुस्तक “शक्ति के 48 नियम” की तरह यह सीधे “गाइड” नहीं करती। यानी ये नहीं बताती कि क्या करना है। इसके बजाय यह मैकियावेली के सिद्धांतों से परिचित कराके शेष आपके विवेक पर छोड़ देती है।

144 पृष्ठों की यह छोटी-सी किताब यूँ तो एक बैठक में पढ़ी तो जा सकती है, लेकिन इसे समझने और इसका उपयोग करने के लिए आपको ठंडे दिमाग़ से सोच-विचार करना होगा। इस पुस्तक की एक बड़ी उपयोगिता है कि यह नेक व्यक्तियों को एक दिशा देती है।

पुस्तक : मैकियावेली; नेक व्यक्तियों के लिए
लेखक : पवन चौधरी
प्रकाशक : विज़्डम विलेज पब्लिकेशन प्रा.लि.
मूल्य : 175 रुपए