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शुभारम्भ

यह जानना ज़रूरी है…

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सफलता ‘सफलता’ है, ‘सफ़लता’ नहीं। इसमें फूल (पुष्प) वाला ‘फ’ है, न कि अँग्रेज़ी के फ़ूल (मूर्ख) वाला नुक़्ते सहित ‘फ़’। यानी रोमन लिपि में इसे Saphalta लिखा जाना चाहिए, न कि Safalta।
यह ब्लॉग जीवन की ऐसी ही छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिलाने के लिए है, जो बड़ी मायने रखती हैं।

हरदा से आई हादसे की ख़बर

यही टीवी पत्रकारिता का मज़ा है। हर कठिन परिस्थिति में छोटी-छोटी ख़बर तलाशो। कुछ सेकंड की हो, भले ही एक बार चले, मगर हर वक़्त ख़बर पर भिड़े रहो।

मंगलवार की शाम से रात तक हो रही बारिश अब डराने लगी थी। सोते समय ही लग गया था, कल कहीं न कहीं जाना ही पड़ेगा। इंदौर-उज्जैन और देवास में रात में तेज़ बारिश और निचले इलाक़ों में पानी भरने की ख़बरें पत्रकारिता के नए प्लेटफ़ॉर्म वॉट्सएप पर आने लगी थीं।

अपने संवाददातों को अलर्ट कर सोया ही था कि तक़रीबन सवा बारह बजे फ़ोन बजा। स्क्रीन पर चमक रहा था – ‘हरदा समद’। ये हरदा के संवाददाता थे, जो घबराए हुए थे और बताया कि सर, कामायनी एक्सप्रेस की दुर्घटना की ख़बर है। हरदा स्टेशन के पास माचक नदी के पुल पर गाड़ी के कुछ डिब्बे पानी में भी गिर गए हैं। स्टेशन जा रहा हूँ, बाक़ी ख़बर वहीं से दूँगा।

समद से बात करते-करते ड्रॉइंग रूम में आ गया था और पेन-काग़ज़ लेकर गाड़ी का नाम, नंबर और माचक नदी लिखने लगा था। नींद हिरन हो गई थी। ट्रेन एक्सीडेंट और वो भी पानी में गिरे डिब्बे, सोचकर ही होश उड़ गए थे। रेलवे में अपने संपर्कों को फ़ोन मिलाने लगा था।

आधी रात को किसे जगाऊँ, ये झिझक भी थी। मगर फ़ोन जारी थे। कहीं से झिड़की मिल रही थी, तो कहीं से ख़बर का थोड़ा-सा सिरा। मगर थोड़ी देर बाद फिर समद अपडेट लेकर आए, जो और भी ज़्यादा डरावना था। “सर, नदी में एक नहीं दो गाड़ियाँ गिरी हैं। कामायनी के साथ ही जनता एक्सप्रेस भी उसी वक़्त पुल से गुज़र रही थी, दोनों के डिब्बे गिरे हैं। पानी कितना है ये अभी नहीं बता सकता। कलेक्टर साहब स्टेशन पर आ गए हैं। इटारसी से राहत और बचाव वाली ट्रेन आ रही है। संभव हुआ तो उसी में हम सब भी जाएँगे।”

इस बीच में एक-दो नंबर गाड़ियों में सफ़र कर रहे लोगों के मिल चुके थे। जल्दी ही उनसे बात की और ख़बर पक्की होते ही दफ़्तर में इस हादसे की सूचना दे दी। अपने टीवी के पत्रकार साथियों से भी ख़बर का ब्योरा लगातार मिल रहा था।

तय हो गया कि इस बारिश में दुर्घटनास्थल पर निकलना ही होगा। फ़ोन भी लगातार बज रहा था और बैग में सामान भी इकट्ठा हो रहा था। बारिश का मतलब बरसाती, छाता और प्लास्टिक की चप्पल वग़ैरह-वग़ैरह। तेज़ी से हरदा पहुँचने के लिए गाड़ी का इंतज़ाम भी इस बीच में कर लिया था। पूरी तैयारी के बाद ही पत्नी को बताया कि हरदा जा रहे हैं, बस दरवाज़ा बंद कर लो।

तक़रीबन ढाई बजे कैमरामैन मुन्ना भाई और सहायक अभिषेक के साथ हरदा के रास्ते पर बरसते पानी के बीच चले जा रहे थे। तब तक चैनल पर ख़बर ब्रेक हो गई थी। सोचा था गाड़ी में आँखें बंद करेंगे, मगर चैनल पर धाराप्रवाह फ़ोनो चल रहे थे। घटना कैसे हुई, कहाँ हुई, कितने मरे हैं, राहत के क्या इंतज़ाम हैं।

तब तक समद घटनास्थल पर जा पहुँचे थे। उनका मोबाइल कभी लगता, कभी नहीं। उन्हें भी निर्देशित कर रहे थे, बस थोड़े-से शॉट लेकर निकलो जल्दी। मगर वो निकलें तो निकलें कैसे। घटनास्थल भिरंगी स्टेशन के पास था जो हरदा से क़रीब 32 किलोमीटर दूर होगा। तेज़ बारिश और अँधेरे में कहाँ और कैसे जाएँ, ये सोचना भी कठिन हो रहा होगा। जिस रेलवे की ट्रेन से आए थे उसी के साथ लौटना होगा, उन्होंने लाचारी जताई।

इस बीच चार बजे चुके थे। पूरा दफ़्तर जाग गया था। दिल्ली और मुंबई से रिपोर्टरों के आने और ओबी निकालने की पूरी तैयारी हो गई थी। सुबह छह बजने को थे और हम हरदा को पार कर बाईपास से बाहर हो रहे थे। मगर ये क्या! खेड़ीपुरा नाके पर अजनाल नदी पर बने पुल के ऊपर से पानी बह रहा था और पुल के दोनों और वाहनों की लंबी क़तार लगी थी। इससे पहले कि बेबसी बढ़ती, मुन्ना ने कहा- सर स्टेशन चलिए। स्टेशन पर पहुँचते ही लाइव यू ऑन और रिपोर्टिंग का काम चालू।

हरदा स्टेशन पर बदहवासी का आलम, रुकी हुई गाड़ियाँ, कामायनी एक्सप्रेस में सफ़र कर रहे दुर्घटना के क़िस्से सुनाते यात्री, सबकुछ ख़बर था और चैनल पर सबकुछ लाइव कट रहा था। हमारे चैनल पर ये क़िस्से चलते देख बाक़ी के चैनल वाले भी स्टेशन आ गए। सबका हाल बुरा था, सभी कुढ़ रहे थे। घटनास्थल के इतने पास आकर ये बेबसी बुरी लग रही थी।

तभी जैसे भगवान ने रिपोर्टरों की सुन ली। दुर्घटनास्थल पर जाने वाली गाड़ी आई और सारे लोग उसमें लद लिए। ऐसे मौक़ों पर लगता है अजीब-सा काम है पत्रकारिता भी। लोग हादसे की जगह से दूर भागते हैं, मगर हम पत्रकार उस जगह पर जल्दी पहुँचने में जी-जान लगा देते हैं।

चलती गाड़ी में ही वॉक थ्रू किए जाने लगे थे। माइक पर हमारे साथी बोल रहे थे- घटनास्थल पर जाना कठिन है, मगर हम जा रहे हैं, वग़ैरह-वग़ैरह। यही टीवी पत्रकारिता का मज़ा है। हर कठिन परिस्थिति में छोटी-छोटी ख़बर तलाशो। कुछ सेकंड की हो, भले ही एक बार चले, मगर हर वक़्त ख़बर पर भिड़े रहो।

थोड़ी देर बाद ही दुर्घटनास्थल दिखने लगा। रेलगाड़ियों के डिब्बे माचिस के डिब्बों सरीखे पलटे हुए थे, कुछ दाईं तरफ़ तो कुछ बाईं। रेल की मज़बूत पाँतें धागे सरीखी टेढ़ी-मेढ़ी हो गई थीं।

पुल तो नहीं वो नाले की पुलिया थी जिससे तेज़ बहाव का पानी नहीं निकल पाया, तो उसने पुलिया के दोनों तरफ़ की मिट्टी बहाकर रास्ता बना लिया और झूलती पटरियों पर बरसते पानी में दो रेलगाड़ियाँ उतर गईं। मगर दुर्घटना के लिए ज़िम्मेदार जिस पानी की बात की जा रही थी, वो घटनास्थल से तक़रीबन ग़ायब ही था। सैलाब के बाद का कीचड़ और गाद पटरियों की दोनों तरफ़ बहुतायत में थी।

राहत के काम के नाम पर रेल के अधिकारी-कर्मचारी समझने की कोशिश में लगे थे कि काम कहाँ से शुरू करें। रेल दुर्घटना की ख़बर सुन आसपास के गाँवों के हज़ारों तमाशबीन लगातार चले आ रहे थे, जिनको सँभालने का काम रेल पुलिस कर रही थी।

रेल की बोगियों में फँसी लाशें निकालने का काम चल रहा था। कुछ लाशें पानी में बहकर दूर खेतों में भी मिल रही थीं। हादसे के पहले कुछ लोगों ने अपने परिजनों को फ़ोन भी लगाए थे, वो सब भी अपनों की तलाश में भागे-भागे आ रहे थे।

खंडवा में रहने वाले बृजेश सिंह अपने बेटे-बहू की तस्वीर लेकर आए थे। आँसूभरी आँखों से बता रहे थे कि जब डिब्बे में पानी भरा, तो बेटे ने रात साढ़े ग्यारह बजे फ़ोन किया कि पापा, यहाँ से निकालो। खंडवा स्टेशन गया तो अधिकारी ने बताया कि कामायनी का एक्सीडेंट हुआ है, जनता एक्सप्रेस का नहीं। वो लड़ते रहे कि उनका बेटा क्यों झूठ बोलेगा। उन्होंने बेटे और बहू दोनों को बरसात की एक रात में खो दिया।

कामायनी एक्सप्रेस में मालेगाँव के डेढ़ सौ लोग भी थे, जो बनारस जा रहे थे। जब डिब्बे में पानी भरा, तो बुज़ुर्गों के इस दल की एक महिला मथुरा बाई सभी से सँभलने को कह रही थी, मगर जब डिब्बा ज़्यादा तिरछा हुआ, तो सभी के सामने डिब्बे से फिसलकर पानी में जा गिरी।

सबकी आँखों में आँसू भरे थे। दु:ख इस बात का भी था कि तीर्थयात्रियों का पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने का सामान, पैसा सबकुछ डिब्बों में छूट गया था। डरे और दु:खी लोगों के समूह में सभी के चेहरे पर जान बचने का एहसास ही बाक़ी था।

उधर, राहत सामग्री के साथ आई ट्रेन में ही थाना खुल गया था। मरने वालों की शिनाख़्त और पंचनामा भी चल रहा था। पुलिसवाले शव गिन रहे थे – कितने हैं, 24 या 26- अच्छे से गिनो। अभी तो 26 थे, कम कैसे हो गए। यही शव, ख़बर तलाश रहे हम सरीखे ख़बरनवीसों के लिए सबसे बड़ी ख़बर थे। कितने मरे, कितने घायल, इसी आँकड़े से ख़बर बड़ी और छोटी होगी।

वहीं पर सफ़ेद चादरों में लिपटी लाशों के बीच सुबक रहे थे गोटेगांव के नारायण रजक, जिनके परिवार के 11 लोग इस हादसे में जान गँवा बैठे। वो अपने साथ वालों से कह रहे थे कि ज़रा अम्मा के पास खड़े रहो, उनको अकेला मत छोड़ो। उनकी अम्मा सफ़ेद चादर में लिपटी पड़ी थीं। उमरा और हीरापुर गाँव के ये लोग साईं बाबा के दर्शन करने शिर्डी जाने के लिए जनता एक्सप्रेस में चढ़े थे, मगर धूनीवाले बाबा के शहर खंडवा भी नहीं पहुँच पाए।

ख़ैर, जब इन सारे लम्हों को कैमरे में क़ैद कर लिया, तो अब इनको भेजने की उतावली मची। जो रेलगाड़ी आई थी, वो अपनी मर्ज़ी से जाएगी। और टीवी रिपोर्टर को इतना धीरज कहाँ कि गाड़ी के जाने का इंतज़ार करे।

मैं, मुन्ना और अभिषेक दुर्घटना की जगह पर पसरे भारी कीचड़ को पार करते हुए निकल पड़े खिरकिया की ओर अनजान लोगों की मोटर साइकिलों पर सवार होकर। हमें बताया गया था कि वहाँ पर आइडिया का नेटवर्क मिल जाएगा ओर हम अपने लाइव यू से फुटेज भेज पाएँगे। दफ़्तर से फ़ोन पर फ़ोन चले आ रहे थे – फुटेज भेजो, जल्दी भेजो, किसी भी तरह भेजो।

खिरकिया पहुँचते ही हमारी मुश्किल कम होने के बजाय बढ़ गई। भारी बारिश से यहाँ का नेटवर्क भी बंद पड़ा था। इस बीच में राहत की ट्रेन हमारे टीवी के दूसरे दोस्तों को लेकर हरदा रवाना हो गई थी। अब हम यहाँ फँस गए थे। न यहाँ के न वहाँ के!

आनन-फानन में हरदा जाने के लिए गाड़ी की ओर चल पड़े अपनी क़िस्मत को कोसते हुए वापस। मगर क्या मालूम था कि क़िस्मत तो बीच रास्ते में हमारा ही इंतज़ार कर रही थी। अचानक नेटवर्क मिला और गाड़ी रोककर हमने सारा फुटेज मिनटों में भेजा, जो सीधा ऑन एयर था। अब जाकर हमारी जान में जान आई।

मगर ये जानकर आज भी दुख होता है कि तीस लोगों की जान लेने वाले इस हादसे की लापरवाही की ज़िम्मेदारी कोई नहीं उठा रहा। अचानक आई बाढ़ को इसका कारण बताया जा रहा है, मगर रेल पटरियों की निगरानी की अनदेखी की चर्चा कोई नहीं कर रहा। दुर्घटनास्थल के पास दोनों गेटों के फ़ोन भी दो दिन से बंद थे।

तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु दिल्ली से भागकर भोपाल आए और वहीं से लौट गए। यदि वो हरदा तक आते, तो रेल विभाग की लापरवाही को आँखों से देखते।

ज़ाहिर है, जब भी आप रेल में बैठें, तो ऊपरवाले प्रभु के भरोसे ही बैठें।

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(यह अंश लेखक और प्रकाशक की अनुमति से। पुस्तक में ऐसी कुल 75 कहानियाँ हैं।)

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पुस्तक : ऑफ़ द स्क्रीन; टीवी रिपोर्टिंग की कहानियाँ

लेखक : श्री ब्रजेश राजपूत

प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल

मूल्य : 250 रुपए

ख़बरों के पीछे की रोमांचक कहानियाँ

अगर आप टीवी पर न्यूज़ देखते हैं तो इसे पढ़ें और अगर नहीं देखते तो इसे ज़रूर पढ़ें…

वह बारिश का ऐसा ही एक दिन था। आसमान में बादल घिर आए थे, पर बरस नहीं रहे थे। उन दिनों मैं एक दुमंज़िला मकान की लंबी-चौड़ी छत पर बने एकमात्र कमरे में अकेला रहा करता था।

उस दिन दफ़्तर में “विश्व की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ” नामक पुस्तक मेरे हाथ लगी थी और उसे इत्मीनान से पढ़ने की चाह लिए मैं अपेक्षाकृत जल्दी लौट आया था।

किताब दुनियाभर के जाने-माने लेखकों की कहानियों का संकलन थी। चेख़व, मोपासाँ जैसे कुछ नाम जाने-पहचाने थे, तो कुछ नितांत अपिरिचत भी थे। ऐसे ही एक अनजान लेखक की कहानी मैंने बेमन से पढ़नी शुरू की।

कहानी अच्छी थी, उत्सुकता बनाकर चल रही थी, लेकिन… लेकिन असल धमाका हुआ अंत में। उसका अंत इतना अप्रत्याशित था कि मैं कुर्सी से उछल पड़ा। यहाँ “कुर्सी से उछलना” महज़ एक मुहावरा नहीं है, बल्कि मैं वाक़ई उछल पड़ा था और कमरे से बाहर आकर रोमांच और उत्तेजना के मारे छत पर दौड़ रहा था।

वह ओ. हेनरी से मेरी पहली “मुलाक़ात” थी। वह दिन था और आज का दिन है, ओ. हेनरी मेरे सर्वप्रिय लेखक हैं। उनकी किसी कहानी ने मुझे निराश नहीं किया। ज़ाहिर है, वे ऐसे ही दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले तीन लेखकों में शुमार नहीं होते।

इस यादगार मुलाक़ात के बरसों बाद, हाल ही में मेरा परिचय हुआ श्री ब्रजेश राजपूत से। जी हाँ, इस बार भी लेखक से सीधे नहीं, उसकी किताब के माध्यम से मुलाक़ात हुई। और उनकी पुस्तक “ऑफ़ द स्क्रीन; टीवी रिपोर्टिंग की कहानियाँ” पढ़ते हुए मैं एक बार फिर हेनरी की तरह के एहसासों से गुज़रा।

इस बार अंतर सिर्फ़ यह था कि किताब का पहला लेख पढ़ते हुए मैं कुर्सी से चिपक गया। किताब की पहली स्टोरी है- “हरदा से आई हादसे की ख़बर”। यह आधी रात को नदी में ट्रेन गिरने की सूचना से शुरू होती है और टीवी पर इस ख़बर के प्रसारित होने के बाद ख़त्म होती है।

क़रीब चार पृष्ठों के इस लेख में चालीस उतार-चढ़ाव होंगे। दुर्घटना स्थल पर पहुँचने से लेकर रिपोर्ट बनाने और वहीं से भेजने तक की क़वायद में हर पल हालात ऐसे बदलते रहते हैं कि पाठक भी आशा, निराशा, चिंता और सुकून की लहरों में डूबता-उतराता रहता है।

गुणी पत्रकार रशीद क़िदवई कहते हैं कि ब्रजेश के लेखों को पढ़ते हुए आप देखते और सुनते भी हैं। बतौर पाठक मैं कह सकता हूँ कि क़िदवई जी ने बिल्कुल सच कहा है। किताब के 75 में से ज़्यादातर लेख रोमांचक खोज यात्राओं की तरह हैं, जिनमें आप रिपोर्टर के साथ-साथ चलते हैं।

ब्रजेश शब्दों से माहौल का चित्र खींचते हैं, जिसके चलते कभी आप भय के मारे सिहर उठते हैं, कभी भूतों से मुलाक़ात की संभावना मात्र से रोमांच से भर उठते हैं, कभी मौत से सामना होने पर आपकी जान हलक़ में अटक जाती है, तो कभी असहनीय दुर्गंध से गुज़रते हुए आपको उबकाई आने लगती है। कभी-कभी आपका बड़ा सम्मान होता है और कभी लोग आपके सामने ही आपकी बुराई कर रहे होते हैं।

टीवी न्यूज़ की दुनिया में आपका स्वागत है!

वही टीवी न्यूज़, जिसे “घटिया” कहकर हम कई बार नकार देते हैं और चैनल बदलकर “आतंक का गुंडाराज” जैसी किसी दक्षिण भारतीय डब फ़िल्म की तरफ़ बढ़ जाते हैं। मैंने भी लंबे समय से टीवी पर समाचार देखना छोड़ रखा है।

मुझे तो टीवी रिपोर्टरों से और भी ज़्यादा शिकायतें थीं/ हैं। मुझ जैसे हिन्दी-भक्त को टीवी की भ्रष्ट भाषा हज़म ही नहीं होती। इसके अलावा, एक “सौतिया डाह” क़िस्म की चीज़ भी होती है। ख़बरों की दुनिया के ही हिस्से होने के बावजूद प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दो ध्रुवों की तरह हैं। प्रिंट वालों को लगता है कि टीवी वालों का काम नौटंकी की तरह निरर्थक है और टीवी वालों को लगता है कि छपे हुए को आजकल पढ़ता ही कौन है, सो छापना ही व्यर्थ है!

सच कहूँ, तो ज़्यादातर टीवी रिपोर्टर मुझे “बेवकूफ़” लगते थे। ध्यान दें, मैं “हैं” नहीं “थे” कह रहा हूँ। “ऑफ़ द स्क्रीन” पढ़ने के बाद मेरी यह धारणा बदली है। ब्रजेश की लेखनी में दोहराव नहीं है, वे व्यर्थ का विस्तार नहीं करते, अनावश्यक भूमिकाएँ नहीं बाँधते और बिना लाग-लपेट सबकुछ कह देते हैं।

मेरा ख़्याल है कि ब्रजेश “आस्तीक” की तरह हैं। महाभारत ख़त्म होने के बाद, कलियुग के आरंभ में आस्तीक एक ऋषि थे। उनके पिता मानव और माता नागकन्या थीं। जब अर्जुन के प्रपौत्र जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्पयज्ञ करके तक्षक समेत सभी सर्पों का समूल नाश कर देना चाहा, तो आस्तीक ने मध्यस्थ बनकर नागों की रक्षा की थी।

ब्रजेश में भी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों के गुण हैं। उनकी भाषा प्रिंट वाली है, तो शैली टीवी की। वे लेखन में गंभीर टिप्पणियाँ करते हैं, तो उसे टीवी वालों की तरह चुटीला अंदाज़ भी देते हैं। यानी उन्होंने अपने लेखन से न केवल टीवी रिपोर्टरों की छवि को “मटियामेट” होने से बचा लिया है, बल्कि उसे एक हद तक सँवारा भी है।

बहरहाल, “ऑफ़ द स्क्रीन” ने मेरी कुछ और ग़लतफ़हमियाँ भी तोड़ी हैं। ख़ासतौर पर हल्की-फुल्की स्टोरीज़ को लेकर। किताब की एक स्टोरी- “टीवी में नॉन न्यूज़ भी न्यूज़ होती है, ज़रा समझा करो” पढ़कर सचमुच समझ में आया कि निरर्थक लगने वाली ख़बर भी किस तरह पब्लिक डिमांड और ऊपर के दबाव में बनानी पड़ती है और उस आसान-सी स्टोरी के लिए भी कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं।

किताब में नर्मदा में तैरते शिवराज सिंह चौहान हैं और फटी टी-शर्ट वाले “महाराजा” ज्योतिरादित्य सिंधिया भी। इसमें झाड़ियों में फँसी एक नवजात बच्ची की दिल को छू लेने वाली कहानी है, एक चर्चित एक्टिविस्ट का हत्याकांड है और उत्तराखंड की भीषण आपदा भी है। यहाँ चुनावी क़िस्से हैं और अधिकारियों के खटकरम भी। बीच-बीच में कुछ सकारात्मक कहानियाँ भी हैं। आपने अब तक टीवी पर जितनी तरह की न्यूज़ स्टोरीज़ देखी होंगी, लगभग सब इसमें हैं।

मेरी सलाह है कि यदि आप टीवी न्यूज़ देखते हैं, तो इसे पढ़ें… और अगर नहीं देखते, तो इसे ज़रूर पढ़ें। दोनों ही स्थितियों में आपका नज़रिया काफ़ी हद तक बदल जाएगा।

पाठक को बाँधकर रखने के अलावा, यह लेखक की एक और बड़ी ख़ूबी है।

© विवेक गुप्ता

पुस्तक : ऑफ़ द स्क्रीन; टीवी रिपोर्टिंग की कहानियाँ
लेखक : श्री ब्रजेश राजपूत
प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल
मूल्य : 250 रुपए

निकृष्टता के रसातल पर

“मुन्नाभाई एमबीबीएस” वाले फ़िल्मकार ने “संजू” बनाई है। हीरानी के इस सफ़र के लिए ही पतन, अधोगति, गिरावट जैसी संज्ञाएँ हैं।

(यह फ़िल्म नहीं, फ़िल्मकार की समीक्षा है)
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भोपाल की ज्योति टॉकीज के उस अँधियारे में परदे की रोशनी दर्शकों के चेहरों पर पड़ रही थी। पूरा हॉल ठहाकों से गूँज रहा था। लोगों के दाँत चमक रहे थे। परदे पर “थ्री ईडियट्स” का “धन = स्तन” वाला दृश्य चल रहा था।

थोड़ा-बहुत हँस तो मैं भी रहा था, पर मैं कुछ हैरान भी था। कारण यह कि जिस घटिया लतीफ़े पर वह दृश्य आधारित था, उसे मैं पहले तीन-चार बार पढ़ चुका था और मेरा ख़्याल था कि अधिकांश लोगों ने उसे पढ़ रखा होगा। फिर भी लोग पेट पकड़-पकड़कर हँस रहे थे।

…लेकिन सब नहीं। मैंने देखा, मुझसे एक पंक्ति आगे बैठी एक लड़की का सिर झुका हुआ था। उसके आसपास बैठे लोग भी असहज थे। शायद वे एक ही परिवार के थे। और ज़ाहिर है, बलात्कार-चमत्कार, स्तन-धन पर कोई सभ्य व्यक्ति कम-से-कम अपने परिवार के साथ तो नहीं हँस सकता।

फूहड़ हरकतों का महिमामंडन, “तोफ़ा” क़ुबूल हो जैसी अश्लीलता और कचरा साफ़ करने वाले वैक्यूम क्लीनर की मदद से प्रसव कराया जाना… साफ़ था कि हीरानी फ़िल्मी मसालों के चक्कर में फँस गए हैं। इस फ़िल्म के बाद मुझे लग गया कि राजकुमार हीरानी ने अपना शिखर अपनी पहली लोकप्रिय फ़िल्म से छू लिया है और अब उन्हें गिरना ही है। और हुआ भी यही।

“मुन्नाभाई एमबीबीएस” वाले फ़िल्मकार ने “संजू” बनाई है। हीरानी के इस सफ़र के लिए ही पतन, अधोगति, गिरावट जैसी संज्ञाएँ हैं। हीरानी का यह पतन चौंकाता नहीं है, क्योंकि यह अचानक नहीं हुआ है। मुन्नाभाई उनका शिखर था और संजू रसातल। इन दोनों के बीच वे क्रमश: गिरते ही गए हैं।

यह सिनेमाई गुणवत्ता, मनोरंजन की क्षमता, लोकप्रियता और कमाई के बारे में नहीं है। यह तय है कि संजू, मुन्नाभाई से दस गुना पैसे कमाएगी और शायद हज़ार करोड़ का रिकॉर्ड भी तोड़ दे।

यह तो फ़िल्मकार के मानसिक स्तर की बात है। यह तो सुनील दत्त जैसे धर्मात्मा के आवारा, नशेड़ी, शराबी, अय्याश, आतंकवादियों से रिश्ते रखने वाले और सज़ायाफ़्ता अपराधी बेटे के जीवन पर फ़िल्म बनाने के बारे में सोचने की बात है।

मैंने कहीं पढ़ा था कि सुनील दत्त हुसैनी ब्राह्मण थे। सातवीं सदी में भारत के सम्राट हर्षवर्धन ने कर्बला के युद्ध में इमाम हुसैन की सहायता करने के लिए अपने सैनिकों का एक दस्ता रवाना किया था। वह दस्ता समय पर नहीं पहुँच पाया, वरना आज इस्लाम का इतिहास कुछ और होता। उसी दस्ते में शामिल सैनिक के वंशज थे, सुनील दत्त।

मैंने तो यहाँ तक पढ़ा है कि सुनील दत्त ने पत्नी नरगिस की मौत के बाद उन्हें इस्लामिक रीति से दफ़नाया और मुसलमानों से माफ़ी माँगी कि मैंने आपके मज़हब की स्त्री से विवाह करके आप लोगों को दु:ख पहुँचाया।

उस सुनील दत्त की औलाद है संजय दत्त, जिसने एके-56 रखने के बारे में अपने बाप के सवाल पर जवाब दिया था मेरी रग़ों में मुस्लिम ख़ून दौड़ रहा है। मुंबई शहर में जो हो रहा था, उसे मैं बरदाश्त नहीं कर सकता था (संदर्भ : तहलका की स्टोरी, बरास्ते बीबीसी)।

राजकुमार हीरानी ने उसी संजय दत्त की जीवनी बनाई है, जो फ़िल्म में बड़े अहंकार से कह रहा है कि मैं 300 महिलाओं के साथ सोया। संजय की कहानी के ज़रिए हीरानी कौन-सा संदेश देना चाहते हैं? निश्चित तौर पर, यह डाकू के संत बनने की कथा तो नहीं कि कोई प्रेरणा मिले। क्या कोई यक़ीन करता है कि जेल जाने के बाद संजय दत्त सुधर गया है?

यह भी ठीक है कि बॉलीवुड के भांडों ने दाऊद इब्राहीम से लेकर गुजराती डॉन तक को महिमामंडित करते हुए फ़िल्में बनाई हैं। लेकिन सबको पता है कि ऐसी फ़िल्में किसके पैसों से और किस तरह के उद्देश्य से बनाई जाती हैं। हीरानी कम-से-कम उस श्रेणी के तो नहीं हैं।

फिर मेरी जिज्ञासा है कि क्या महज़ संजय दत्त के साथ अपने संबंधों के लिए उन्होंने अपनी अब तक की ख्याति और छवि को दाँव पर लगा दिया है? या फिर वे बहक गए हैं… हालाँकि भटक तो वे पहले ही गए थे…

© विवेक गुप्ता

इस किताब ने मुझ जैसे संत आदमी को भी मसूरी के होटल में “दो घूँट” चख़वा दिए

मैं शराब नहीं पीता। लेकिन इस पुस्तक में “मिस रिप्ली बीन” द्वारा शराब की चुस्कियाँ लेने का इतनी बार और इतना सम्मोहक वर्णन है कि पृष्ठ 84 तक पहुँचते-पहुँचते मुझे भी “पीने” की तलब होने लगी।

मैंने फ्रिज खोला और बोतल निकाली। चौंकिए नहीं, मैं फिर बता रहा हूँ कि शराब नहीं पीता- न घर में, न बाहर। वह शरबत की बोतल थी। गाढ़े शरबत में पानी मिलाकर पीना था। अचानक मुझे एक ख़ुराफ़ात सूझी।

कॉलेज के ज़माने में मैंने संयोगवश “जिन” के दो घूँट चख़े थे। जहाँ तक मुझे याद है, उन दो घूँटों में थोड़ी खटास थी। सो, मैंने नींबू के शरबत में शरबत कम और पानी ज़्यादा रखा, ताकि मिठास कम हो और थोड़ी खटास का एहसास हो।

…और यक़ीन मानिए, शरबत के उस गिलास के साथ मैं मसूरी पहुँच गया था। मिस रिप्ली बीन का कमरा। वातावरण में वही ठंडक। नीरवता। आरामकुर्सी और जीवन का वही सुकून।

अपराध कथाएँ इतनी ख़ूबसूरती से रस्किन बॉण्ड ही सुना सकते हैं। उनकी पुस्तक “देवदारों के साये में; 8 बेहतरीन नई कहानियाँ” में मसूरी क़स्बा भी एक जीता-जागता किरदार है। आप जब तक किताब पढ़ते हैं, मसूरी के “होटल रॉयल” में एक मेहमान ही होते हैं।

यह रस्किन बॉण्ड की लेखनी की शक्ति है कि पाठक पढ़ता नहीं है, कहानियों के बीच मौजूद होता है। अनुवादक और लेखक श्री आशुतोष गर्ग ने रस्किन के इस जादुई संसार को हिन्दी में हूबहू उतार दिया है।

इन कहानियों में रहस्य और रोमांच तो हैं, पर ये जासूसी कथाएँ नहीं हैं। इनमें अपराधी का पता तफ़्तीश से या बड़े सुराग़ वग़ैरह तलाशकर नहीं लगाया जाता, अक्सर यह संयोग से हो जाता है। लेकिन कहानी कहने की शैली रोमांचित करती है और उत्सुकता भी जगाए रखती है। सहजता और सरलता के साथ रोचकता रस्किन की विशेषता है।

कहानियों का अंत कई दफ़ा चौंकाता है- लेकिन अलग ढंग से। जैसे- “जन्मजात दुष्ट” नामक कहानी में मिस रिप्ली बीन आग लगाने में आनंद लेने वाले लड़के के बारे में बताती हैं, तो आप इतने खो जाते हैं कि आपके मन में सवाल ही नहीं उभरता कि आख़िर मिस रिप्ली बीन उस लड़के के बारे में इतना कुछ कैसे जानती हैं! और यही वजह है कि अंत चौंकाता है, हालाँकि थोड़ी-सी तर्कबुद्धि का प्रयोग करके आप उसे पहले ही जान सकते थे।

“देवदारों के साये” में की कहानियाँ आपको पुराने दौर के मसूरी में लिए चलती हैं, जो आपके बचपन के शहर/क़स्बे की तरह मंथर गति से चलने वाली जगह है। वहाँ पेड़ हैं, पगडंडियाँ हैं, झुरमुटें हैं। बाग़ीचे की बेंच पर बैठकर बर्फ़ से ढँके पहाड़ों को निहारने का आनंद है।

पुरानी तरह का एक होटल है और पिता के दिए वचन को निभाने वाला उसका मालिक है। होटल की स्थायी मेहमान, बुज़ुर्ग महिला मिस रिप्ली बीन और उनका वफ़ादार कुत्ता है। एक पियानोवादक है और संगीत की धुन पर नाचते जोड़े हैं… और हैं शराब की चुस्कियाँ।

किताब का कवर शानदार है। वह ख़ूबसूरत, रहस्यमय वातावरण की अनुभूति कराता है। उसमें मसूरी, पहाड़, देवदार, अँधेरा, रहस्यमय रात, सब समाए हैं।

हममें से ज़्यादातर लोग रस्किन बॉण्ड को बच्चों और किशोरों के लिए उनके लेखन से जानते हैं। बहुतों ने रस्किन की क़लम से निकले रस्टी के क़िस्से पढ़े होंगे और मुमकिन है कि अब तक उसके कारनामों, शरारतों और दुस्साहसी यात्राओं को भूल नहीं पाए होंगे।

और ऐसे बालसुलभ भावों से भरी रस्किन की लेखनी जब अपराध कथाओं पर चलती है, तो हत्या, लालच, पारलौकिक शक्ति, अवैध संबंध और अप्राकृतिक संबंध के उल्लेख के बावजूद कहानियों में वीभत्सता और डरावनेपन जैसा कुछ भी नहीं है।

यही बात इस किताब को ख़ास और बच्चों को छोड़कर, “सभी के लिए” पठनीय बनाती है।
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इतना पढ़ लेने के बाद भी आप दुविधा में हैं कि पुस्तक ख़रीदें या नहीं, तो मैं आपके लिए फ़ैसला लेना और आसान कर देता हूँ। आप इस किताब को अवश्य पढ़ें…
1. अगर आपने लंबे समय से कोई किताब नहीं पढ़ी है
2. अगर आपने अपने जीवन में साहित्य के नाम पर इंजीनियरिंग कॉलेज के लौंडों की शरारतों और सतही इश्क़ का वर्णन ही पढ़ा है
3. अगर आप जानना चाहते हैं कि कहानियाँ कहने की कला क्या होती है
4. और अगर आप जानना चाहते हैं कि लेखन एक स्थायी प्रभाव कैसे छोड़ जाता है।

विवेक गुप्ता

पुस्तक : देवदारों के साये में; 8 बेहतरीन नई कहानियाँ
लेखक : रस्किन बॉण्ड
अनुवादक : आशुतोष गर्ग
प्रकाशक : Manjul Publishing House
मूल्य : 175 रुपए

सावधान : लोग आपकी एक ग़लती की ताक में रहते हैं…

छात्र जीवन का एक अनुभव, जो बताता है कि लोग स्वार्थ में किस हद तक बेशर्म हो सकते हैं।

वह 14 नवंबर का दिन था। शाला प्रांगण में टहलते हुए मेरी निगाह एक तरफ़ जाकर ठहर गई। वहाँ सामान्य से ज़्यादा भीड़ थी। थोड़ा शोर-शराबा भी हो रहा था।

मैं नवीं कक्षा का छात्र था। हमारे स्कूल में काफ़ी गहमागहमी थी। बाल दिवस पर बच्चों का मेला लगा था। कई स्टॉल थे। कुछ खाने-पीने की चीज़ों के, कुछ गेम्स के।

नीम के पेड़ों के नीचे, उस कोने में भीड़ एक स्टॉल को घेरे हुए थी। वातावरण में थोड़ा तनाव भी पसरा था। मैंने उचककर देखने की कोशिश की। वहाँ एक गेम का स्टॉल था। एक टेबल पर प्लास्टिक के छह गिलास “तीन-दो-एक” के क्रम में एक-के-ऊपर एक जमाए गए थे। तीन बार रबर की गेंद मारकर सभी गिलासों को टेबल से नीचे गिराना था।

यह एक सामान्य गेम था, पर देखने वाले लोगों की संख्या असामान्य थी। मैंने भीड़ के बीच से घुसते हुए सामने की ओर जगह बनाई और खड़ा होकर देखने लगा। गिलासों को गिराने के तीन मौक़े एक रुपए में मिल रहे थे। सफल रहने पर इनाम में शायद दस या 15 रुपए मिलने वाले थे।

यह स्टॉल लगाया था श्री शशांक कर्महे ने, जो तब टेक्निकल स्कूल के छात्र हुआ करते थे। खेलने वाला कोई कॉलेज छात्र था, जो टेक्निकल स्कूल के पास ही रहा करता था। शशांक भैया बदहवास थे। चेहरे पर तनाव था और माथे पर पसीना। पैंट में खोंसी गई शर्ट आधी बाहर निकल चुकी थी। उनकी निगाहें टेबल, गेंद और गिलासों पर बराबर जमी हुई थीं। बीच-बीच में वे भीड़ को पीछे ठेलते, जो मारे उत्सुकता के, टेबल की ओर खिसकती जाती थी।

इस सबकी वजह मुझे कुछ देर से समझ में आई। दरअसल, वह युवक काफ़ी समय से खेल रहा था। हर नाकाम कोशिश के बाद वह पैसे चुका देने के बजाय एक और चांस ले लेता था। जब मैंने देखना शुरू किया, उस समय उस पर 60 रुपए चढ़ चुके थे।

तीन गेंद के हर चांस के बाद शशांक भैया ज़ोर से बकाया रुपए बोलते, ताकि भुगतान के वक़्त कोई विवाद न हो। गिनती बढ़ रही थी। 61…62…66…69…70…71…। खेलने वाले युवक का चेहरा भावहीन दिख रहा था, मानो उसने कोई इरादा कर रखा हो।

उस ज़माने में 70-71 रुपए बड़ी रक़म हुआ करते थे, ख़ासतौर पर किसी स्कूली छात्र के लिए। 50 पैसे में कॉमिक बुक किराए पर मिल जाती थी, 75 पैसे में एक समोसा और 60-70 पैसों में अच्छी पतंग ख़रीदी जा सकती थी। मैं खड़े-खड़े हिसाब लगा रहा था कि शशांक भैया को कितना बड़ा फ़ायदा हो चुका है।

72वें रुपए का गेम शुरू हुआ। युवक ने पहली दो गेंदें फेंकीं। गिलास लुढ़के, पर कुल मिलाकर एक ही गिलास टेबल के नीचे गिर पाया। बाक़ी पाँच अब भी टेबल पर ही थे। अंतिम गेंद बाक़ी थी और कोई चमत्कार ही शेष पाँचों गिलासों को ज़मीन पर गिरा सकता था। युवक 71 बार असफल हो चुका था। 72वीं बार किसी को कोई उम्मीद नहीं थी। तीसरी गेंद फेंकने जा रहे उस युवक को ख़ुद भी न रही होगी।

उसने अनमने ढंग से गेंद फेंकी। वह एक गिलास को लगी। गिलास लुढ़का, पर गिर न पाया। इस बीच गेंद टेबल के किनारे की तरफ़ लुढ़की रही थी। उस तरफ़ कोई गिलास न था। ज़ाहिर है, 72वीं कोशिश भी नाकाम हो चुकी थी।

शशांक भैया ने टेबल पर से गेंद को नीचे गिरने से पहले ही उठा लिया और ज़ोर से चिल्लाए- “72…!!” उन्होंने अगले गेम के लिए गेंद युवक की तरफ़ बढ़ाई। लेकिन युवक ने अपने हाथों को झटक दिया। बोला- “तुमने गेंद टेबल से नीचे गिरने से पहले क्यों उठा ली? तुमने मेरा चांस पूरा नहीं होने दिया। यह फ़ाउल है। मैं तुम्हारे पैसे नहीं दूँगा।”

यह कहकर वह जाने लगा। शशांक भैया ने उसे रोकना चाहा, पर वह हाथ छुड़ाकर, “तुमने फाउल क्यों किया…” कहता हुआ चला गया। शशांक स्तब्ध थे। भीड़ हैरान थी। कानाफूसी बढ़ गई। च्च्च्च की आवाज़ें आ रही थीं। सबकी नज़रों में उस युवक के लिए हिकारत का भाव था, पर वह तो स्कूल गेट से भी बाहर निकल चुका था।

शशांक भैया के साथ धोखा हो चुका था। उनके 72 रुपए मारे जा चुके थे। पिछले डेढ़ घंटे से वे उस अकेले ग्राहक को गेंदें उठा-उठाकर दे रहे थे, वह सारी मेहनत व्यर्थ हो चुकी थी। धीरे-धीरे लोग छँटने लगे। शशांक भैया गेंद हाथ में लिए अकेले खड़े रह गए। मैं भी दूसरी तरफ़ बढ़ गया।

स्कूल में बाल दिवस का मेला हर साल लगता था, आगे भी लगता रहा, पर यह घटना मन पर जैसे छप गई। उस समय मैं इस घटना से सबक़ नहीं ले पाया।

बहुत बाद में जाकर मैंने जाना कि लोग किस तरह अपने इरादों को छुपाए रखते हैं।… किस तरह वे आपकी एक ग़लती की ताक में रहते हैं, ताकि उसकी आड़ में आप पर अपना फ़ैसला थोप सकें।… कैसे स्वार्थ में अंधे लोग न्यायोचित दिखने की चाह भी रखते हैं और इस चक्कर में ख़ुद को नंगा कर लेते हैं।… अगर आप कोई ग़लती नहीं भी करते हैं, तो कैसे वे पूरी बेशर्मी से आप पर ग़लती मढ़ देते हैं।… कैसे वे अपने इरादों को पूरा करने के लिए आपसे ग़लतियाँ करवाते हैं…। कैसे-कैसे-कैसे!!

तो अगर आप लोगों को और उनके छुपे इरादों को पहचानना चाहते हैं… बिना अपराध के दंड नहीं भोगना चाहते हैं, तो 72 रुपए के इस धोखे को हमेशा याद रखें।

विवेक गुप्ता

अगर ज़िंदगी बोझ-सी लगती है… तो यह किताब आपके लिए ही है

सेल्फ़ हेल्प की कुछ किताबें आपकी पिटाई लगाती हैं। अगर आप दिन में 12 घंटे काम नहीं करते, तो आप “आलसी” हैं… अगर आपके रिश्ते ख़राब हैं, तो आप ख़ुद “ज़िम्मेदार” हैं… आपने अपना अब तक का जीवन “व्यर्थ” कर दिया है…। वे किताबें आपको गहरे अपराधबोध से भर देती हैं।

लेकिन “गुब्बारे-सी हल्की है ज़िंदगी” उन सबसे उलट है। यह आपको झकझोरती है, नींद से जगाती है, लेकिन उस तरह जैसे माँ जगाती थीं- “उठो लाल अब आँखें खोलो, पानी लाई हूँ मुँह धो लो…!” हौले से, बड़े प्यार से…। इस पुस्तक को पढ़ते हुए कोमल अनुभूति होती है।

एक बात जो मैं इसके बारे में शर्तिया तौर पर कह सकता हूँ, वह यह कि आप इसे तेज़ी से नहीं पढ़ सकते। मेरे पास हालाँकि किताबों की क़तार है, पर मैं इसे चाहकर भी जल्दी “निबटा” नहीं पाया। यह पाठक को “स्लो” करती है।

दरअसल, हम सभी भाग रहे हैं। सिर पर इच्छाओं, अपेक्षाओं और तुलनाओं की गठरी लिए भागने की कोशिश कर रहे हैं। ज़िंदगी के बोझ बन जाने का यही कारण है। ऐसे में, अगर ज़िंदगी “गुब्बारे-सी हल्की” बनानी है, तो कुछ बोझ कम करने होंगे, कुछ धीमे होना होगा। कैसे…? यह पुस्तक बस इसी बारे में है।

जीवन जीने और उम्र के फ़ासले तय कर लेने में आकाश-पाताल जितना अंतर है। यही फ़र्क़ ख़ुशी और आनंद में है। लेकिन क्या आपने कभी ठहरकर ग़ौर किया है कि ख़ुशी और आनंद, दो अलग एहसास हैं? लेखक श्री प्रवीण कुमार गंगराड़े इसी अंतर पर ध्यान दिलाते हैं।

“सुखानुभूति की अवस्थाएँ” शीर्षक वाले अध्याय में वे लिखते हैं कि सुखानुभूति की चार अवस्थाएँ होती हैं- ख़ुशी, सुख, आनंद और परमानंद। इनके बीच के अंतर को समझने के लिए यह ध्यान देना होगा कि ख़ुशी और सुख के विलोम शब्द तो हैं (ग़म और दु:ख), लेकिन आनंद और परमानंद का कोई विलोम नहीं है।

यानी ग़म और दु:ख न हों, तो आप ख़ुश और सुखी होते हैं। मतलब, ये दोनों हालात, सुविधा, आराम आदि पर निर्भर हैं। लेकिन आनंद और परमानंद आंतरिक अवस्थाएँ हैं। आप कम सुविधाओं में भी आनंद से रह सकते हैं और आलीशान गाड़ी में बैठकर भी दुखी हो सकते हैं।

चौंक गए न…? कितनी सामान्य-सी बात है, पर शायद आपने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं था। यह पुस्तक सहज जीवन से जुड़े ऐसे ही बिंदुओं को सहजता से समझाती है। इसलिए, जब आप पढ़ते हैं, तो दरअसल आप सुनते हैं कि लेखक उन शब्दों को “प्रार्थना” की तरह बुदबुदा रहा है। किताब की हर पंक्ति सुचिंतित और सुविचारित है। आप हर पंक्ति को जज़्ब करते हुए पढ़ते हैं। इसे पढ़ने में वक़्त लगने की यही वजह है।

सुख, आस्था और विचार के साथ ही यह धन, स्वास्थ्य और संबंध (रिश्ते-नाते) की चर्चा भी करती है। आख़िर, आप सबकुछ छोड़-छाड़कर हिमालय तो नहीं निकल सकते, आपको रहना तो इसी संसार में है। और इस संसार में रहने के लिए बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति, अच्छे रिश्ते और आर्थिक निश्चिंतता का होना आवश्यक है। इस तरह यह आपको व्यावहारिक धरातल पर भी रखती है।

बहरहाल, यह मनोरंजन नहीं करती, मनोरंजन के लिए लिखी भी नहीं गई है। यह तो मुँह पर ठंडे पानी के छींटे मारकर जगाती है। इसमें कोई आडंबर नहीं है। लेखक को जैसा महसूस हुआ, उन्होंने लिखा और आपको यक़ीन दिलाने के लिए कोई प्रपंच नहीं किए।

इसलिए जब आप इसे धैर्यपूवर्क, धीरे-धीरे, समझते हुए, गुनते हुए, आत्मसात करते हुए पढ़ते हैं, तो यह ऐसा असर छोड़ सकती है, जो ताज़िंदगी क़ायम रहे और शायद आपकी ज़िंदगी ही बदल दे। जीवन की तरह असीम संभावनाओं से भरी इस पुस्तक को “ग्राहक” नहीं, आपके जैसे “गुणग्राहक” पाठक की तलाश है।

© विवेक गुप्ता

पुस्तक : गुब्बारे-सी हल्की है ज़िंदगी

लेखक : श्री प्रवीण कुमार गंगराड़े

प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल

मूल्य : 195 रुपए

“इंडिया” और “ब्लाइटी” में ज़मीन, आसमान का फ़र्क़ है

पहले मैं जब भी “इंडिया” और “इंडियन” जैसे शब्द सुनता था, तो मेरा ख़ून खौल उठता था कि आख़िर हमें गुलाम बनाने वालों द्वारा दिए गए इन नामों को हमने क्यों इतने गर्व से अपनाया है!

फिर जब श्री संदीप नैयर ने बताया कि हम भारतीयों द्वारा ब्रिटेन को “विलायत” का नाम देने पर अँग्रेज़ भी छोटे स्तर पर ही सही, अपने देश को “ब्लाइटी” कहते हैं, तो दिल को थोड़ी ठंडक मिली।

संदीप लंदन में रहते हैं और अँग्रेज़ी में सारा कामकाज करते हैं। लेकिन वे भारत में अपनी जड़ों और संस्कारों से बराबर जुड़े हुए हैं और हिन्दी भाषा व लेखन की बेहतरी के लिए काम करते हैं।

उन्होंने http://literature.life नामक एक अनूठी और हिन्दी में अपनी तरह की पहली वेबसाइट बनाई है। इस पर हिन्दी लेखकों और पुस्तकों के प्रचार-प्रसार के लिए जानकारियाँ, सूत्र, नए आइडिया, अंतर्दृष्टियाँ, विमर्श, चर्चाएँ और विवाद सहित सबकुछ है।

हिन्दी में लिखने वालों के साथ ही पढ़ने वालों के लिए भी यह वेबसाइट बराबर उपयोगी और रोचक है।

बहरहाल, हिंदी के लिए संदीप की इस सराहनीय पहल और उनकी चौतरफ़ा सक्रियता का प्रशंसक होने के बावजूद, मैं वेबसाइट के अँग्रेज़ी नाम से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता।

उन्होंने इस नामकरण के समर्थन में जिस “हौब्सन-जौब्सन शब्दकोश” का संदर्भ दिया है, उसमें भी देखा जाए, तो अँग्रेज़ी में इस्तेमाल होने वाले तमाम भारतीय शब्द अँग्रेज़ों की ज़ुबान के अनुसार तोड़-मरोड़कर ही लिए गए हैं।

दूसरी तरफ़, हम जिस अँग्रेज़ीकरण का विरोध करते हैं, वह ग्रहण करना न होकर हूबहू नक़ल है, जैसे कि वेबसाइट का नाम http://literature.life

अब हालाँकि वेबसाइट का नाम तो नहीं बदला जा सकता, लेकिन इस बहाने हम हिन्दी में कितनी अँग्रेज़ी हो और किस रूप में हो, इस पर बहस/चर्चा तो कर ही सकते हैं।

आज की मधुरिमा, दैनिक भास्कर के अपने नियमित स्तंभ “अपनी हिन्दी” में मैंने हौब्सन-जौब्सन के बहाने इसी महत्वपूर्ण मुद्दे का एक पहलू सामने रखा है।

क्या आपके पास कोई दूसरा पक्ष भी है…?
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अपनी हिन्दी
हौब्सन-जौब्सन के बहाने

ब्रिटेन में बसे प्रवासी भारतीय लेखक श्री संदीप नैयर भाषाओं के बीच खुले दिल से शब्दों का आदान-प्रदान होने के हिमायती हैं। वे इस संबंध में एक रोचक जानकारी देते हैं कि अँग्रेज़ी में भारतीय मूल के इतने सारे शब्द शामिल हो चुके हैं कि उनके लिए अलग से, “हौब्सन-जौब्सन” नामक एक पूरा-पूरा शब्दकोश समर्पित है।

नैयर ‘इंडिया इंक’ नामक अँग्रेज़ी नाटक का संवाद उद्धृत करते हैं। इस एक वाक्य में ही भारतीय मूल के ढेर सारे शब्द हैं- “आई वाज बाइंग चटनी इन द बाज़ार वेन ए ठग हू हैड एस्केप्ड फ्रॉम द चौकी रैन अमोक एंड किल्ड ए बॉक्सवाला फॉर हिज लूट क्रिएटिंग ए हल्लाबलू एंड लैंडिंग हिमसेल्फ इन द मलागटानी (भारतीय मसालों से बना चिकन सूप)।” इसी तरह, अँग्रेज़ी में भारतीयों द्वारा गढ़े गए कुछ शब्द भी आधिकारिक तौर पर शामिल कर लिए गए हैं, जैसे- ईव टीज़िंग और प्रीपोन।

जाहिर है, शाब्दिक आदान-प्रदान से भाषाएँ समृद्ध ही होती हैं। हिंदी ने भी संस्कृत की आधारभूमि पर अरबी, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, पुर्तग़ाली, तुर्की, मराठी, गुजराती, तेलुगू, बांग्ला, पंजाबी आदि तमाम भाषाओं के शब्दों को बड़े प्रेम से अपनाया है। लेकिन यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि यह “ग्रहण” ज़बरदस्ती नहीं, सहज रूप से होता है। इस प्रक्रिया में स्थानीय शैली के हिसाब से बाहरी शब्दों का स्वरूप बदलता है, उनका अर्थ विस्तारित या संकुचित होता है या फिर उन्हें एक नया अर्थ भी मिल सकता है। जैसा कि नैयर बताते हैं, भदेस अँग्रेज़ी में प्रयुक्त होने वाला “ब्लाइटी” शब्द इसकी मिसाल है। हम अँग्रेज़ों के देश को “विलायत” कहते थे, तो वे भी कहने लगे, जो कालांतर में “ब्लाइटी” हो गया है।

तात्पर्य यह कि भाषा को बिगाड़ने वाले योजनाबद्ध अँग्रेज़ीकरण का विरोध तो हो, पर सहजता से शामिल होने वाले शब्दों का नहीं।